भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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२९० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-११-१२ एतच्चेति, यत् त्रिदशादीनां भविनां चैतन्यं कर्तृतांशस्य प्राधान्यान्मलेन संविद्भागस्य निमज्जितत्वात् कर्तृतामयं चिद्रूपस्य तत्त्वं स्वातन्त्र्यं कलारूपेण परमेश्वरशक्त्यात्मना तत्त्वेन 'उपोद्वलितम्' अनुप्राणितं मलेन न्यक्कृतं सद्बुद्धोधितं शून्यादेर्देहपर्यन्तस्य मायाप्रमातुः संबन्धि, 'गुणत्वेन अप्रधानत्वेन स्थितं, यतो 'मितम्' इदन्तापन्नदेहादिशून्यान्तप्रमेयभागनिमग्नत्वात् प्रमेयं, यो गौरो, यः सुखी, यस्तृषितो, यः सर्वरूपरहितः सोऽहम्,—इति हि इदन्तैवान्तर्ली- नाहंभावा संसारिणां परिस्फुरति । सेयं जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तरूपा संसारावस्था । यदा तूक्तगुरूपदेशा- दिदिशा तेनैवाहंभावेन स्वतन्त्र्यात्मना व्यापकत्वनित्यत्वादिसंपरामर्शाभात्मनि विदधता ततः शून्यादेः प्रमेयादुन्मज्ज्येवास्यते तदा तुर्यातीतावस्था । यदापि परामृष्टतथाभूतवैभवनित्यैश्वर्यादि- धर्मसंभेदेनैवाहंभावेन शून्याविदेहधात्वन्तं सिद्धरसयोगेन विध्यते, तदास्यां तुर्यदशायां तदपि प्रमेयतामुज्झतीव । सेयं द्वय्यपि जीवन्मुक्तावस्था 'समावेश' इत्युक्ता शास्त्रे । सम्यगावेशनमेव हि तत्र तत्र प्रधानं, तत्सिद्धये तूपदेशान्तराणि । यथा गीतम्—'मय्यावेश्य मनो ये मां ।' (गी० १२।२) इति 'अथावेशयितुं चित्तं ।' (गी० १२।९) इत्यादि च । समावेशपल्लवा एव च प्रसिद्धदेहादिप्रमातृभागप्रह्वीभावभावनानुप्राणिताः परमेश्वरस्तुतिप्रणामपूजाध्यानसमाधिप्रभृतयः जो देव लोग हैं उनमें कर्तृत्व का अंश प्रधान होने के कारण और मल से संवित् ज्ञानांश तिरोहित हो जाने से कर्तृत्वमय जो चेतन है उसके स्वातन्त्र्य कलारूप परमेश्वर की शक्तिरूप तत्त्व से तिरस्कृत हो जाने के कारण शून्यादि से लेकर देह पर्यन्त माया प्रमाता का सम्बन्धी बनता है, वह 'गुणत्वेन' अप्रधान होकर रहता है जिससे 'मितं' परिमित कहलाता है और देहादिरूप में आया हुआ देह से लेकर शून्य तक प्रमेय भाग में डूबा हुआ होने के कारण वह प्रमेय भी कहलाता है, जिस कारण यह भान होता है कि यह गौर है, यह सुखी-समृद्ध है, यह प्यासा है, सब रूप से रहित वही मैं हूँ, इसी इदन्ता के भीतर लीन होकर अहंभावना जीवों में स्फुरित होती है । वही यह जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्तिरूप से संसार अवस्था कही जाती है । जब गुरु के उपदेशामृत को सुन कर उस स्वतन्त्ररूप अहंभाव से व्यापकत्व, नित्यत्व, शुद्धत्वादि अपने धर्मों का परामर्श करता हुआ उन शून्यादि प्रमेय से ऊपर उठ जाता है तब उस की तुर्यातीत अवस्था हो जाती है । उस परामर्श में अपना नित्य ऐश्वर्यादि धर्मों का परामर्श करके अहंभाव के द्वारा शून्यादि देहधातु तक छेदा हुआ रहता है । जैसा कि सिद्धरस से स्वर्ण, तब प्रमेयत्व को छोड़ता हुआ सा उस तुर्यातीत अवस्था में भी आत्मा के स्वरूप का बोध करने लगता है । इसलिए इन दोनों को जीवन्मुक्त अवस्था 'समावेश' शास्त्र में कहा है; क्योंकि उसमें अच्छी प्रकार समाहित ही जाना ही प्रधान माना जाता है, उसकी सिद्धि के लिए दूसरे उपदेश भी कहते हैं । 'मय्यावेश्य मनो ये मां नित्य युक्ता उपासते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः [ १२-२ ] श्रीमद्भगवद्- गीता में श्री कृष्णचन्द्र ने कहा है कि मुझ वासुदेव परमात्मा में जो भक्त अपने मन को श्रद्धा एवं भक्ति से स्थिर करता है वह परम उत्तम योगी माना जाता है । 'अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् । अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ।।' [ १२-९ ] हे अर्जुन ! जो मुझ में चित्त को समाहित करने में असमर्थ हो, ता तुम अभ्यास के बल से भी मुझे पाने की इच्छा कर तुच्छ समावेश ही प्रसिद्ध प्रमातृभाव के अपने में लीन होने से