ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-३, आ.-२, का.-११-१२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २८९ मुख्यतया संनिपत्य संसरणे कारणम् । यथोक्तम् 'कर्मतस्तु शरीराणि विषयाः करणानि च ।' इति । तनूकरणविषयसंबन्ध एव च वर्तमानो भविष्यंश्च, — इत्यनवरतं प्रबन्धतो वर्तमानः संसरणमुच्यते । आणवमायामलौ तु यद्यपि न कारणं संसारे, तथापि कार्मण विना तौ देहादि- विचित्रभावाभिनिर्वर्तनशक्तिशून्यौ विज्ञानाकलादिषु, — इति मुख्यं कार्ममेव मलं संसारकारणं तत्र तत्र शास्त्रे गण्यते । अत एव तदुपक्षये वृत्ते दत्तस्तावदसंसरणसोपानपदबन्धः, — इत्याशयेन कर्मबन्धाभिमानपरिहानिरेव यत्नतः सांख्यपुराणभारतादिशास्त्रेषूपदिश्यते । एवं मलत्रयस्यैकैक- भेदैस्त्रिभिर्द्विभेदैस्त्रिभिश्चैकभेदेनैकेन, — इति सप्त प्रमातार उत्तिष्ठन्ति । तथा च शास्त्रे 'शिवादि- सकलान्ताश्च शक्तिमन्तः सप्त ।' इत्युक्तम् । तत्राप्यवान्तरभेदेन गुणमुख्यताभेदेन विकल्पसमुच्चयता- विभेदेन चानन्तप्रकारत्वमिति ॥ १० ॥ अस्य च मलत्रयस्योद्भवतिरोभावभेदात् संसारिणां प्रकारद्वयम्, — इति दर्शयति— कलोद्बलितमेतच्च चित्त्तत्त्वं कर्तृतामयम् । अचिद्रूपस्य शून्यादेर्मितं गुणतया स्थितम् ॥ ११ ॥ मुख्यत्वं कर्तृतायाश्च बोधस्य च चिदात्मनः । शून्यादौ तद्गुणे ज्ञानं तत्समावेशलक्षणम् ॥ १२ ॥ उन मलों में मुख्यरूप से तो संसरण-आवागमन चक्र में डालनेवाला कार्ममल है। इस विषय में कहा गया है कि कर्म से शरीरादि विषय और इन्द्रिय वर्ग हुआ करते हैं। तनूकरण इन्द्रियों का जो विषम सम्बन्ध है वही वर्तमान और भविष्य है, इस प्रकार निरन्तर अबाध्य गतिपूर्वक अनादिकाल से चलनेवाला संसार कहा जाता है, आणवमल और मायामल यद्यपि संसार के लिए निमित्त नहीं होते, तथापि कार्ममल के बिना आणवमल और मायीमल दोनों देहादि विचित्रभाव के निर्माण के लिए असमर्थ होते हैं। जैसे विज्ञानकलों में देखा जाता है, इस प्रकार शास्त्र में कार्ममल को ही संसार के लिए मुख्य कारण माना गया है। अत एव उसके क्षय हो जाने पर तो जीव संसरण अर्थात् जन्म-मरणरूपी सोपान से मुक्त हो जाता है, इस आशय से कर्म बन्धन के अभिमान को यत्न के साथ बन्द करने के लिए ही सांख्य, पुराण, महाभारतादि शास्त्रों में उपदेश दिया गया है। इस प्रकार तीनों मलों का एक भेद से, दो भेदों से और तीनों भेदों से तथा एक भेद से सात प्रमाता हो जाते हैं। तथा शास्त्र में कहा गया है— शिव से लेकर [ शिव, मन्त्रमहेश्वर, मन्त्रेश्वर, विद्येश्वर, विज्ञानाकल, प्रलयाकल और सकल ] प्रमाता तक सात प्रमाता शक्तिशाली होते हैं।' उनमें भी अवान्तर भेद, मुख्य गौण के भेद और विकल्प समुच्चय के भेद से असंख्य प्रमाता हो जाते हैं ॥ १० ॥ इस प्रकार इन तीनों मलों के उत्पन्न एवं तिरोहितभाव के भेद से संसारी जीवों के दो प्रकार की गति हो जाती है, इसे दिखाते हैं— कला से प्रकाशित होकर चित्तत्त्व कर्तृता से मिला हुआ, अचिद्रूप शून्यादि के गौणभाव से रहनेवाला परिमित-परिच्छिन्न हो जाता है ॥ ११ ॥ वह चिदात्मक ज्ञान का एवं कर्तृत्व का मुख्य कारण होता है। गौणशून्यादि में वही समा- वेशरूप ज्ञान कहा जाता है ॥ १२ ॥ ३७