भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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२८८] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-१०

इह विद्येश्वरविज्ञानाकलास्तावन्न भविनो मायान्ताध्वातिक्रमणात्; प्रलयाकला अपि कंचित्कालमविद्यमानभवाः । ये त्वेते मायातत्त्वान्तरालपरिवर्तिनो देवादयः स्थावरान्ताश्चतुर्द- र्शधा शास्त्रेषु परिगणितास्ते सर्वे 'भविनः' संसारिणः, तेषां च त्रयोऽपि युगपन्मलाः । ननु मलत्रयमध्ये कतमो मलः संसरणमेषां संपादयेत् ? आह, 'तत्रापि' तेषु त्रिष्वपि सत्सु कार्मं मलं विद्येश्वर और विज्ञानाकल इत्यादि लोग संसारी नहीं होते; क्योंकि ये लोग तो मायाध्व से ऊपर उठे हुए होते हैं; प्रलयाकल प्रलय पर्यन्त ही रहते हैं इसके बाद मुक्त हो जाते हैं। ये जो भी मायातत्त्व के भीतर हैं वे सब के सब परिवर्तन गतिवाले देवताओं से लेकर स्थावर तक सभी जीव तथा शास्त्रों में जो चतुर्दश भुवनों में रहनेवाले को गिने गये हैं वे सभी 'भविनः' संसारी हैं और उनमें आणवमल, कार्ममल और मायीयमल एक साथ ही रहते हैं। अब शङ्का होती है कि इन तीनों मलों में से कौन सा मल संसार के लिए हेतु माना जाय ? इस पर कहते हैं कि 'तत्रापि' १. प्रलयाकल को प्रलय केवली एवं शून्य-प्रमाता के नामों से भी कहे जाते हैं। प्रलयाकल प्रमाता में माया का प्राधान्य है जिससे अहं प्रत्यवमर्श का स्फुट रूप में ज्ञान नहीं हो पाता है और न तो 'इदम्' का ही स्फुट बोध हो पाता है इसमें प्रायः चेतना-शक्ति की शून्य अवस्था बनी रहती है जिस तरह सुषुप्ति अवस्था में शून्य जैसा बोध होता है वैसा ही इसको भी शून्य बोध होता है। प्रलयाकल में सृष्टि और संहार के मध्य में प्रकृति से तादात्म्य रहता है और शून्य दशा में गये हुए साधक की भी स्थिति वैसी होती है। प्रलय अर्थात् संहार अवस्था में कला इत्यादि के विलीन हो जाने पर नूतन सृष्टि के प्रारम्भ काल में होने तक प्रलयाकल मायातत्त्व में विद्यमान रहते हैं इनमें आणवमल और मायीयमल मुख्यरूप से रहते हैं एवं कार्ममल का अभाव रहता है। २. अष्टविकल्पो दैवस्तैर्यग्योनश्च पञ्चधा भवति। मानुष्यश्चैकविधः समासतो भौतिकः सर्गः। संक्षेप में भौतिक सृष्टि चौदह प्रकार की होती है। जिसमें ब्राह्म, प्राजापत्य, ऐन्द्र, पैत्र, गान्धर्व, याक्ष तथा पैशाच यह आठ प्रकारकी सृष्टि देवताओंकी मानी जाती है। इनमें ब्रह्म सम्बन्धी ब्रह्मलोक तीन हैं सत्यलोक, तपलोक, जनलोक । सत्य लोक में स्वयं ब्रह्मा का निवास रहता है, अथवा 'ब्रह्मवित् ब्रह्मैव भवति' इस न्याय से स्वयं ब्रह्मभूत जीव जो कि प्रत्यक्ष दर्शी ॐकार के उपासक परमहंस रूप उसमें निवास करते हैं। तपलोक सत्यलोक के नीचे हैं- अभास्कर, महाभास्कर, सत्यमहाभास्करसंज्ञक देवता लोग जो कि ब्रह्मा के साक्षात् निकट रहते हैं। इसके नीचे तपलोक है जितेन्द्रिय, ब्रह्मपुरोहित, ब्रह्म कायिक, ब्रह्म महाकायिक लोग निवास करते हैं। महातापक प्रजापति के लोक में कुमुद, ऋभव, पतर्दन, अजनाभ, अमिताभ संज्ञक एक सहस्र कल्प की आयुवाले देवता लोग निवास करते हैं। इसके नीचे स्वर्ग नामक ऐन्द्रलोक में अणिमा, लघिमा, वशित्व इत्यादि सिद्धिवाले सिद्ध लोग जो कि स्वेच्छा से शरीर धारण करनेवाले होते हैं उनकी एक कल्प की मात्र आयु होती है। पैत्रलोक में पितृ लोग रहते हैं। सुमेरु पर्वत के पृष्ठ भाग में गान्धर्व लोक है जिसमें गन्धर्व, किन्नर आदि रहते हैं गन्धमादन पर्वत पर यक्ष लोग हैं जिसमें यक्ष कुबेर सयूथ निवास करते हैं। वितल लोक को छोड़कर अतल सुतल, तलातल, रसातल आदि छः लोकों में राक्षसों का निवास है। वितल में भूत पिशाच, ब्रह्मराक्षस, कूष्माण्ड विनायक आदि लोग निवास करते हैं और पशु, पक्षी, मृग, सर्प, वृक्ष इत्यादि, तिर्यक् जातीय सृष्टि पाँच प्रकार की है और एक प्रकार की मानुषी सृष्टि है।