भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-३, आ.-२, का.-९-१० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २८७ योगिनः सवेद्यसौषुप्तपदलीनाः। स्थूलदेहेन्द्रियात्मककार्यकरणवियोगरूपत्वं तु प्रलयाकललक्षणं सर्वेषां तुल्यम् ॥ ८॥ एवं 'स्वातन्र्यस्याप्यबोधता' इत्येवमंशः स्फुटीकृतः, प्रसङ्गाच्च कार्ममलस्य विषयो दर्शितः, मायामलस्य च पाक्षिकत्वमुक्तम् । अधुना पुनराणवकार्ममलद्वयाभावेऽपि शुद्धोऽस्ति मायाख्यस्य मलस्य विषयः,–इति दर्शयति— बोधानामपि कर्तृत्वजुषां कार्ममलक्षतौ । भिन्नवेद्यजुषां मायामलो विद्येश्वराश्च ते ॥ ९ ॥ ये चिन्मात्रमेवात्मतया पश्यन्ति 'अहम्' इति च चमत्का रोल्लासात् कर्तारस्तत एव सर्वज्ञाः सर्वकर्तारश्च ते विद्येश्वराः। किन्तु तनुक रणभुवनादि यदेषां वेद्यतया कार्यतया च भाति तत् कुविन्दपटदृष्ट्या भिन्नमेव सत्,—इत्यास्ति विद्येश्वराणां मायाख्यमलयोगः ॥ ९ ॥ अथ मलत्रयस्यापि यौगपद्येन यो विषयस्तं दर्शयितुमाह— देवादीनां च सर्वेषां भविनां त्रिविधं मलम् । तत्रापि कार्ममेवैकं मुख्यं संसारकारणम् ॥ १० ॥ भिन्न वेद्य संवेदन ज्ञानवाले संवेद्य सौषुप्तपद में लीन रहते हैं। स्थूलेन्द्रियात्मक कार्य-कारण के अभाव में तो इन सभी प्रलयाकल लक्षणवालों में समानरूपता बनी रहती है ॥ ८ ॥ इस प्रकार 'स्वातन्र्यस्याप्यबोधता' इस अंश की स्पष्टतापूर्वक व्याख्या कर दी और प्रसङ्ग को लेकर कार्ममल का भी विषय दिखा दिया तथा मायामल का पाक्षिकत्व [ कभी रहना एवं कभी न रहना ] कह दिया । अधुना पुनः आणवमल एवं कार्ममल इन दोनों के अभाव में भी माया नामक मल का विषय शुद्ध होता है, इसी को दिखाते हैं— मायामल के विनष्ट हो जाने पर कर्तृत्व प्राप्त करनेवाले ज्ञानियों में भी जो कि भिन्नरूप से वेद्य को जानते हैं उन्हीं में मायामल रहता है और वे विद्येश्वर कहे जाते हैं ॥ ९ ॥ जो चिन्मात्र को ही आत्मरूप से देखते हैं, उन्हीं में 'अहम्' इस चमत्कार उल्लास से अप्रतिहत ज्ञान-क्रिया रहती है इसी से वे सर्वज्ञ, सर्वकर्ता विद्येश्वर कहलाते हैं । किन्तु जिनको सूक्ष्मरूप में करण भुवनादि अनेक वेद्यरूप से और कार्यरूप से दिखायी देता है, तन्तुवाय वस्त्र की दृष्टि से अत्यन्त भिन्न ही वह सद्रूप में रहता है, अतः विद्येश्वरों में मायामल का योग रहता है ॥९॥ अब आणव, कार्म और मायीय इन मलों का एक साथ जो विषय है उसे दिखाने के लिए कहते हैं— सभी देवताओं और सांसारिक जीवों में ये तीनों मल रहते हैं। उनमें भी एकमात्र कारण संसार के लिए कार्ममल ही है ॥ १० ॥ १. अहम् प्रत्यवमर्श में अभिन्नरूप से भाव विद्येश्वर लोगों का होने के कारण कर्तृत्व-शक्ति से युक्त रहते हैं इसीलिए सर्वज्ञ सर्वकर्तार भी कहे जाते हैं जब अप्रतिहतरूप से ज्ञान एवं क्रिया-शक्ति के रह जाने पर तो आणवमल का न रहना स्वाभाविक ही सिद्ध हो जाता है; क्योंकि अप्रतिहत ज्ञान एवं क्रिया-शक्ति तो सर्वकर्तृत्ववालों में ही रहती है और उनमें आणवमल का सर्वथा अभाव ही रहता है । वे लोग संसार से उत्तीर्ण हो जाने के कारण कर्म संसार से शून्य हो जाते हैं ।