ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
DevanagariHindipublished343 पृष्ठ
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२८६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-२, का.-८ इत्यादौ 'विज्ञानं' बोधात्मकं रूपं 'केवलं' स्वातन्त्र्यविरहितमेषामिति ॥ ७ ॥ एवं 'स्वातन्त्र्यहानिर्बोधस्य' इत्यस्य भागस्य विज्ञानाकलविषयतामुक्त्वा 'स्वातन्त्र्य- स्याप्यबोधता' इत्यमुमंशं विषयप्रदर्शनेन स्पष्टयति— शून्याद्यबोधरूपास्तु कर्तारः प्रलयाकलाः । तेषां कार्मों मलोऽप्यस्ति मायोयस्तु विकल्पितः ॥ ८ ॥ शून्ये जडत्वादबोधरूपे एव, यदि वा प्राणे बुद्धौ वा येषाम् अहमिति चमत्कारयोगात् कर्तृत्वं ते प्रलयेन कृताः 'अकल:' कलातत्त्वोपलक्षितकरणकार्यरहिता अबोधरूपाः कर्तारश्च । प्रलयावधि हि ते तथाभूता उत्तरकालं तु कार्यकारणसंबद्धा एव भवन्ति; यतस्तेषां न केवलमुक्त रूप आणव एव मलो यावत् कार्मोऽपि वासनासंस्काररूपो धर्माधर्मात्मास्त्येव । यद्येवं, भिन्नवेद्य- प्रथाप्येषां स्यात् । सत्यम्, संवेद्यरूपे सुषुप्तपदे, ऽपवेद्ये तु न भवति; तेन मायीयो मल एषां विकल्पितो व्यवस्थितविषयत्वेन । तथा हि—केऽपि शून्यादिभागविश्रान्ता गाढनिद्राजडीकृता अपवेद्यसुषुप्तपदभाजः । अन्ये तु बुद्ध्यादिनिष्ठाः सुखदुःखावशेषसामान्यात्मकभिन्नवेद्यसंवेदन- कलों में मात्र एक ही मल रहता है, 'विज्ञानं' ज्ञानात्मक रूपता ही 'केवलं' मात्र इनमें है, परम स्वातन्त्र्य का अभाव विज्ञानकलों में रहता है ॥ ७ ॥ इस प्रकार 'स्वातन्त्र्यहानिर्बोधस्य' इस भाग से विज्ञानाकल की विषयता को लेकर कह दिया 'स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता' इस अंश का विषय दिखाने के लिए स्पष्ट करते हैं— शून्यादि प्रमातृवर्ग तो अबोधरूप होने से प्रलयाकल कर्ता कहे जाते हैं। उन प्रलयाकलों में कार्ममल भी रहता है, किन्तु मायीयमल तो विकल्परूप से रहता है ॥ ८ ॥ जडरूप होने के कारण अबोधरूप प्राण और बुद्धि में जिनकी 'अहन्ता' अर्थात् चमत्कार सारपूर्वक कर्तृत्व-शक्ति रहती है वे प्रलयाकल कहे जाते हैं; कलातत्त्व से उपलक्षित कार्य-कारण से रहित बोधरूप कर्ता होते हैं; क्योंकि वे लोग प्रलय पर्यन्त वैसे के वैसे रहते हैं और उत्तरकाल में तो कार्य-कारणभाव से सम्बन्धित होकर अवस्थित रहते हैं; जब कि उनमें केवल पहले कहा हुआ आणवमल ही नहीं रहता, अपितु वासना संस्काररूप धर्मा-धर्मात्मक कार्ममल भी रहता है। यदि ऐसी बात है, तब तो इनमें भिन्न प्रथा भी रहेगी। [ आपका कहना ] ठीक ही है, सवेद्यरूप सुषुप्तपद में तो है, किन्तु अपवेद्य में तो नहीं होता है; इसलिए इन प्रलयाकलों में मायीयमल विकल्पित विषयरूप से व्यवस्थित होकर रहता है। देखो—कोई तो शून्यादि भाग में विश्रान्त होकर गाढनिद्रा में जडीभूत हुए कुछ भी नहीं समझते और सुषुप्तपद में पड़े रहते हैं। दूसरे प्रमातृवर्ग तो बुद्धि इत्यादि में रहनेवाले सुख एवं दुःख को सामान्य विशेषरूप से भिन्न-
यह ठीक नहीं है, जब ईश्वर की इच्छा बोधसार स्वभाववाले को भेद से युक्त करती है तो बोधात्मक स्वभाववाले का ही भेद क्यों करते हैं ? प्रमातृ-तत्त्व से भिन्न घटादि वर्ग में भेद उत्पन्न करे ? क्योंकि हमने इस विषय में अनेक बार कह दिया है कि इसको छिपाना बड़ा ही कठिन होगा इसमें ऐसा होना तो स्वाभाविक है और मैं कृश हूँ, मैं सुखी हूँ, इत्यादि भेद तो इसमें कदम-कदम पर भरे पड़े हुए दिखायी देते हैं ।