ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-११ प्रधानवशीकारयोगित्वात् सर्वमेव प्रमेयम् । संसारिणामप्यनुमानागमादिविशा प्रमेयमेव, — इतीयत् प्रमेयम् । कालादयस्तु प्रमेया अपि प्रमातर्येव लग्नाः, —इति प्रमातृशक्तिस्वभावत्वात् न प्रमेयत्वेनेहावसरे मायाप्रमातृव्यतिरिक्तप्रमेयप्रस्तावात्मनि गणिताः । वस्तुतो हि अत्र योऽयं प्रमातापि स प्रमेय एव, स तु प्रमात्रीक्रियमाण आच्छादितप्रमेयताक इहोच्यते ॥ १० ॥ नन्वत्र त्रयोविंशतौ किं कार्यं किं करणम् ? इत्याशङ्क्याह— त्रयोदशविधा चात्र बाह्यान्तःकरणावली । कार्यवर्गश्च दशधा स्थूलसूक्ष्मत्वभेदतः ॥ ११ ॥ प्रमातुः पूर्वं करणोपयोगः, —इत्यत्रादौ त्रयोदश करणानि; तत्र बुद्धिरध्यवसायसामान्य- मात्ररूपा, ग्राह्यग्राहकाभिमानरूपोऽहंकारः, सङ्कल्पादिकारणं मनः, —इत्यन्तःकरणं त्रिधा । बुद्धौ शब्दाद्यध्यवसायरूपायामुपयोगीनि बुद्धीन्द्रियाणि पञ्च—श्रोत्रं, त्वक्, चक्षुः, जिह्वा, घ्राणम्, —इति । कर्मणि तूपयोगीनि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि । तथा हि—त्यागो ग्रहणं द्वयम्, —इति बहिर्विषयं यत् तत्र पाणिः पायुः पादः, —इति करणानि । एतद्देवान्तः प्राणे येन क्रियते तद्वा- लाते हैं । सांसारिक जीवों की भी अनुमान एवं आगम शास्त्र के द्वारा प्रमेयता सिद्ध होती है, इतने तक प्रमेय तत्त्व की सीमा है । कालादि भी तो प्रमेय तत्त्व के अन्तर्गत हैं किन्तु प्रमाता में मिले हुए रहते हैं, इसलिए वे सभी प्रमातृ-शक्ति के स्वभाववाले होने के कारण प्रमेयरूप से इस माया प्रमाता से व्यतिरिक्त प्रमेय के प्रस्ताव में नहीं गिने गये हैं । वस्तुतः इसमें जो प्रमाता है वह भी प्रमेय ही है, प्रमेयता से आच्छादित कर देने के कारण उसे प्रमाता बना दिया जाता है ॥ १० ॥ अब शङ्का करते हैं कि इन तेइस प्रकार के प्रमेय तत्त्वों में कौन कार्य है और कौन करण कहलाते हैं ? इस आशङ्का के समाधान के लिए कहते हैं— पञ्चज्ञानेन्द्रिय, पञ्चकर्मेन्द्रि, मन, बुद्धि और अहङ्कार इन तेरह को करण कहते हैं । पञ्चमहाभूत, पञ्चतन्मात्राएँ स्थूल-सूक्ष्म के भेद से ये दस प्रकार के कार्य हैं ॥ ११ ॥ सर्वप्रथम प्रमाता करण अर्थात् इन्द्रियों का उपयोग करता है; इसी कारण इसमें पहले तेरह प्रकार के करण का ही निरूपण किया गया है । निश्चय करना बुद्धि का धर्म माना जाता है, ग्राह्य [ प्रमेय और ग्राहक प्रमाता ] में अभिमान करना अहङ्कार का लक्षण है, संकल्प-विकल्प करना मन का धर्म है, इस प्रकार इन तीनों को लेकर अन्तःकरण कहा जाता है । बुद्धि में शब्दादि ज्ञान का निश्चय करनेवाली पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ हैं इनका नाम जैसे श्रोत्र, त्वक्, नेत्र, रसना और घ्राण हैं । कर्म में उपयोगी होने के कारण कर्मेन्द्रियाँ भी पाँच प्रकार की होती हैं । देखिये—त्याग करना एवं ग्रहण करना ये दोनों बाहरी विषय कहलाते हैं जो हस्त, पायु और पाद १. इस प्रकार पुरुष की दो करणेन्द्रियाँ रहती हैं ज्ञान में विद्या और क्रियायें कला । अत एव अन्धे व्यक्ति में ज्ञान नहीं रहता और पङ्गु में क्रिया का अभाव रहता है । विद्यातत्त्व के बिना इन्द्रियवर्ग की अपनी स्वयं की कार्य इत्यादि संपादन में कुछ भी गति नहीं हो सकती है और कला के बिना उसमें कर्तृत्व-शक्ति एवं ज्ञातृत्व-शक्ति का भी उद्भव नहीं हो सकता । इसलिए पुरुषों में मुख्यरूप से तो विद्या और कला को ही इन्द्रियकरण माना गया है ।