भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-३, आ.-१, का.-१० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २७७ न च तद्बुद्धिगतमवैराग्यमेव, तद्धि स्थूलं वृद्धस्य प्रमदायां न भवेदपि रागस्तु भवत्येव । बुद्धि- धर्मष्टकेऽपि च दृष्टोऽभिष्वङ्गः । अत्रैव कस्मादभिष्वङ्ग, — इत्ययमर्थो नियत्या नियम्यते इति । एवं कलाविद्याकालरागनियतिभिरोतप्रोतो माययापहृतैश्वर्यसर्वस्वः सन् पुनरपि प्रतिवितीर्णतत्सर्व- स्वराशिवमद्ध्यगतभागमात्र एवंभूतोऽयं मितः प्रमाता भाति—इदानीमिदं किंचिज्जानानः, इदं कुर्वाणोऽत्र रक्तोऽत्रैव च यः सोऽहम्—इति । एषां च भिन्नविषयत्वमपि भवति कदाचित्— यथान्यत्र रक्तोऽपि नियत्यान्यत् कार्यते—इति । एते च प्रमातृलग्नतयैव भान्ति,—इति तस्यैव शक्तिरूपाः प्रतिप्रमातृभिन्ना एव, कदाचित् तु नटमल्लप्रेक्षादावीश्वरेच्छया एकीभवेयुरपि । न ह्येषामीश्वरेच्छातिरिक्तं निजं किमपि जीवितमस्ति,—इत्यसकृदुक्तं वक्ष्यते च ॥ ९ ॥ यदुक्तमिदमित्यत्र प्रमेये व्यतिरेकिणि माता,—इति तत्र तत्प्रमेयं दर्शयति— त्रयोविंशतिधा मेयं यत्कार्यकरणात्मकम् । तस्याविभागरूप्येकं प्रधानं मूलकारणम् ॥ १० ॥ यत् कार्यकारणरूपं त्रयोविंशतिप्रकारं, यच्च तस्य मूलभूतं कारणं सर्वकार्यकरणाविभागरूपं प्रधानं नाम तत्सर्वं मेयम्,—इति सम्बन्धः । योगिमन्त्रतदीश्वरप्रभृतीनां हि भूततन्मात्रकरण- कर देने के समान राग होता है और वह बुद्धि में होनेवाली आसक्ति नहीं है; क्योंकि वह स्थूल है, वृद्धजन की कामिनी में आसक्ति बढ़ती ही जाती है चाहे काम करने की शक्ति भले ही न हो इस प्रकार वृद्धावस्था न भी हो किन्तु अनुराग तो देखा जाता है । अभिष्वङ्ग बुद्धि ऐश्वर्यादि धर्म अष्टक में भी देखा गया है । इसीमें क्यों आसक्ति होती है ? इसलिए यह अर्थ नियति से नियमित होता है एवं कला, विद्या, काल, राग और नियति से ओतप्रोत होकर, जिसका ऐश्वर्य माया के द्वारा अपहृत हो जाता है अर्थात् समस्त ऐश्वर्य लूट जाने पर भी उसमें कुछ अंश को लेकर ऐसा ही परिमित प्रमाता के रूप में भासित होता हुआ, मैं इस समय कुछ जानता हुआ, कुछ करता हुआ संसक्त होकर इसीमें जो कि वह मैं स्वयं हूँ । इनकी भिन्न विषयता भी कभी-कभी हुआ करती है—जैसे जिससे अन्यत्र आसक्त होता हुआ भी नियति के कारण दूसरा कार्य कराया जाता है । ये सभी प्रमाताओं में ही संलग्न होकर भासित होते हैं, उसीकी शक्तिरूपवाले प्रत्येक प्रमाताओं में भिन्न-भिन्न रूपों में भासित होते हैं, कदाचित् नट-मल्ल इत्यादि की कला देखने के समान ईश्वर की इच्छा से दर्शकों की दृष्टि एकत्र हो जाती है । इनकी ईश्वर की इच्छा से भिन्न अपनी निजी इच्छा विशेष नहीं रहती है, इस विषय में हम अनेक बार कह चुके हैं, आगे भी कहेंगे ॥ ९ ॥ प्रमेय में भिन्नरूप से प्रमाता रहता है—इस विषय में कह दिया गया है । अब उस प्रमेय को दिखाते हैं— जो कार्य-कारणात्मक तैइस प्रकार के प्रमेय तत्त्व हैं । उनका संमिलितरूप एक प्रधान तत्त्व ही मूल कारण माना गया है ॥ १० ॥ जो कार्य-कारणरूप तैइस प्रकार के प्रमेय तत्त्व हैं जो कि समस्त कार्य-कारणभाव के अविभागरूप प्रधान ही उन प्रमेयों का मूलभूत कारण हैं यही इन सबका सम्बन्ध है । योगी, मन्त्र अर्थात् विद्येश्वर, ईश्वर-मन्त्रेश्वर और मन्त्र महेश्वर इत्यादिकों में प्रमेय तत्त्व ही रहते हैं; क्योंकि भूत तन्माएँ, इन्द्रियवर्ग, प्रधान-प्रकृति के वशीभूत हो जाने के कारण ये सब के सब प्रमेय कह-