भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 299, कुल 343 में से

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पृष्ठ 299

२७६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-९ यश्च प्रमाता शून्यादिः प्रमेये व्यतिरेकिणि । माता स मेयः सन्कालादिकपञ्चकवेष्टितः ॥ ९ ॥ स्यादैश्वर्यधर्मयोगः शून्यादेः, यदि अहमित्याभिनिविश्यमानोऽपि नेयतां जह्यात्; तथा हि सति प्रमेयमध्यस्य नीलादिव्यतिरिक्ततया नैव भासेत । यावता यः शून्यादिः प्रमाता कथितः, स यावदेव स्वरूपाद्व्यतिरेकाभिमते नीलादौ प्रमेये माता तावदेव स्वयमपि मेयभूत एव सन् माता । मेयं हि मीयमानत्वाव परिमितम्,—इति तादृशादेव मेयान्तरादुपपन्नव्यतिरेकं, न त्वेवं चिद्रू- पमपरिमितत्वात् । परिमितत्वं च शून्यादेरहंभावस्य यत् तदेव कालादिपञ्चकम् । तथा हि कालः क्रममासूत्रयन् प्रमातरि विजृम्भमाणस्तदनुसारेण प्रमेयेऽपि प्रसरति, योऽहं कृशोऽभवं स स्थूलो वर्ते भविष्यामि स्थूलतरः,—इत्येवमात्मानं देहरूपं क्रमवन्तमिव परामृशंस्तत्सहचारिणि प्रमेयेऽपि भूतादिरूपं क्रमं प्रकाशयति । अस्य शून्यादेर्जडस्य विद्या किंचिज्ज्ञत्वोन्मीलनरूपा बुद्धिदर्पणसंक्रान्तं भावराशिं नीलसुखादिं विविनक्ति । कला किंचित्कर्तृत्वोपोहलनमयी कार्य- मुद्भावयति, किंचिज्जानामि किंचित्करोमि,—इति । अत्र चांशे तुल्ये किंचित्त्वे कस्मादिदमेव किंचित्,—इत्यत्रार्थेऽभिष्वङ्गरूपः प्रमातरि देहादौ प्रमेये च गुणारोपणमय इव रागो व्याप्रियते । जो शून्यादि प्रमाता हैं उनसे भिन्न प्रमेय के रहने पर, वह प्रमाता प्रमेयरूप होकर ये कालादि पञ्च कञ्चुकों के द्वारा आवेष्टित हो जाता है ॥ ९ ॥ विशुद्ध ऐश्वर्य सर्वज्ञत्व, सर्वकर्तृत्वदि धर्म का योग, शून्यादि प्रमाताओं में भले ही होवें 'अहम्' इस अभिनिवेश से युक्त होकर यदि वह प्रमेयता को छोड़ दे, ऐसा रहने पर ही प्रमेय भी इसका नीलादि-पदार्थों से भिन्न होकर नहीं भासित हो सकेगा । इसलिए यह सब शून्यादि प्रमाता कहा जाता है, जब तक वही स्वरूप से भिन्नरूप नीलादि प्रमेय में प्रमाता बनता है तब तक ही प्रमेय बना हुआ कहलाता है, प्रमेय भी सीमित होने के कारण परिमित अर्थात् संकुचित हो जाता है, इसलिए उसी प्रकार के दूसरे घटादि प्रमेयों से भिन्नरूप में प्राप्त होने के कारण, वह चिद्रूप नहीं हो सकता, चिद्रूप का स्वरूप तो अपरिमित-अपरिच्छन्न होता है । परिमितरूपता शून्यादि प्रमाताओं में अहंभाव का प्राप्त होना है वही कालादि पञ्चक है। देखिये—कालक्रम को दिखाता हुआ प्रमाता में प्रकाशित होकर उसके अनुसार प्रमेय में भी फैल जाता है, तब वह कहने लगता है कि मैं कृश था, वही अभी मैं स्थूल हो गया हूँ तथा आगे इससे भी अधिक स्थूलता को प्राप्त हो जाऊँगा । इस प्रकार देहरूप आत्मा को क्रमवाले के समान मानता हुआ एवं उसका सहचारी प्रमेय में भी भूतादिरूप से क्रम को प्रकाशित करता है। इसी कारण इस शून्यादि जड़ की विद्या जो [ प्रमाता में आरोप करती है ] किञ्चित् ज्ञत्व उन्मीलनरूप बुद्धि दर्पण में संक्रान्त नील- सुखादि भावराशि के पृथग्रूप से विवेक करती है। कला-महेश्वर का स्वरूप तिरोहित कर देने पर, अणुरूप में ढल जाने पर जिससे उसका सर्वकर्तृत्व संकुचित होकर एक सीमा में सीमित हो जाता है, किञ्चित् कर्तृत्व में विनिमय हो जाता है वही कला है अर्थात् किञ्चित् कर्तृत्व को प्रकाशित करती हुई कार्य को उद्बुद्ध करती है, जिससे कि मैं जानता हूँ—ऐसा अनुभव होता है और किञ्चित् मैं सम्पादन भी करता हूँ । इसी अंश में किञ्चिद्रूप से समानता होने पर ही क्यों इतना ही किञ्चित् है, इस अर्थ में अभिष्वङ्गरूप प्रमाता, देहादि और प्रमेय में गुण का आरोप

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