ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 298, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-३, आ.-१, का.-९ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २७५ वेद्यप्रतिबिम्बनवती वा बुद्धिरभिनिविश्यते । अन्तरहं वेद्मि दुःख्यहमिति चिन्ताद्यवस्थासु, शरीरमेव पृथिवीप्रायं कृशोऽहमित्यादिदशासु अहमित्यात्मतया भाति । सर्वं चैवेदं शून्यादि वस्तुतश्चिन्मात्रसारमेव माययैव तावदचिद्रूपतया भासितम् । तथाविधमेव तु सत् अहमिति संविद्रूपताभिनिवेशस्थानं संपादितमप्रशान्तजडभावमेव, - इति दुष्करतमवस्तुसंपादनाप्रतिघात- रूपा परमेश्वरस्य मायाशक्तिः, - इत्येतत् 'विजृम्भते' इत्यनेन दर्शितम् । वाग्रहणेन वेद्यरूपाणां सुतधनदारादीनामप्यहंताभिनिवेशविषयत्वमसंख्यातं सूचयति ॥ ८ ॥ नन्वचिद्रूपत्वादनात्मा यदि शून्यादिस्तदात्मतयाऽसौ अभिनिविश्यमानश्चिद्रूप एव, - इति सर्वज्ञत्वसर्वकर्तृत्वादिविशुद्धैश्वर्यधर्मैव स्यात्, - इत्याशङ्क्याह- श्वास अर्थात् प्राण वायु लेने में और श्वास निकालने में अथवा तो मैं स्वयं श्वास को लेता हूँ और स्वयं ही श्वास को बाहर की ओर निकालता हूँ,- मानो कि वायु के समान प्राणतत्त्व ही रहता है, जड-जीवजङ्गम को खा डालने के लिए क्रोध की अभिव्यक्ति होने पर तेजपुञ्ज से बढा हुआ प्राण ही रहता है, स्वच्छ निर्मल जलाशय के समान वेद्यभावों में प्रतिबिम्बित होनेवाली बुद्धि का अभिनिवेश देखा जाता है। मैं भीतर जानता हूँ, मैं दुःखी हूँ इस तरह चिन्तादि अवस्थाओं में, जब कि शरीर प्रायः पृथिवी तत्त्व से बना हुआ है; उसी में भी मैं गौरवर्ण हूँ, मैं स्थूल-सुन्दर हूँ इत्यादि अवस्थाओं में 'अहम्' आत्मरूप से भासता है यह सब शून्यादि तत्त्ववस्तु का चिन्मात्र सार ही है जो माया के द्वारा अचिद्रूप अर्थात् वेद्यभाव से भासता है,-"तद्विहीनं किञ्चित्" इस न्याय से शुद्ध चिन्मात्र का ही यह सारा का सारा विलास-उल्लास दृष्टिगोचर होता है, समस्त वेद्यगत भाव तो माया का स्वरूप है। अचिद्रूप का तिरस्कार न करना, मैं सद्रूप हूँ- ऐसे संविद्रूपता का अभिमान करना मायीय अप्रशान्त जडभाव ही तो है, इस प्रकार दुष्करतम अवस्तुरूप के सम्पादन करने में कभी कहीं भी न रुकनेवाली परमेश्वर की माया-शक्ति कहलाती है। [मायातत्त्व स्वरूप का गोपन कर देती है और अपरिमेय भेदों की जननी है। जिसमें परमेश्वर का स्वरूप तिरोहित हो जाता है। यह तिरोभाव माया और उसके पञ्च कञ्चुकों द्वारा होता है। 'मा' धातु से माया शब्द सिद्ध हुआ है जिसका आशय यह है कि मापना अर्थात् मापकर अलग कर देना एक निर्धारित सीमा में सीमित कर देना। पदार्थों को एक दूसरे से पृथक् कर देती है 'अहम्' अंश को इदमंश से एवं इदमंश को अहमंश से भिन्न कर देती है, नाना भेदों के सर्जन करनेवाली होने के कारण माया-शक्ति कहलाती है ।] यह कारिका में दिया गया 'विजृम्भते' क्रियापद से अवगत होता है। 'वा' शब्द के ग्रहण से द्योतित होता है कि पुत्र, कलत्र, कनक इत्यादि वेद्य-पदार्थों में असंख्य प्रकार से अहन्ता का अभिमान करना भी तो माया-शक्ति का सब व्यापार है ॥ ८ ॥ अब शङ्का की जाती है कि शून्यादि प्रमातृवर्ग अचिद्रूप होने के कारण अनात्मा होते हुए भी आत्मरूप से जाने जाते हैं। इसी कारण वे सब के सब अभिनिविश कर लेने से चिद्रूप ही हो गये, जिससे उनमें सर्वज्ञत्व, सर्वकर्तृत्वादि विशुद्ध ऐश्वर्यधर्म भी मिल जायेंगे, -इस आशङ्का का उत्तर देते हैं-