भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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२७४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-८ सुषुप्ते प्रलये 'न' इत्यभावसमाधौ च तावच्छून्यमाकाशकल्पमनात्मरूपं वेद्यभावोचितम् 'अहम्' इत्यात्मत्वेन वीक्ष्यते; उच्छ्वसननिःश्वसनादौ वा अहमुच्छ्वसिमि,—इति प्राणो वायु- कल्पः, स्थावरजङ्गमजिघत्सामन्युप्रज्वलनादौ वा प्राण एव तेजः समुपबृंहितः, स्वच्छोदकाशयकल्पा सुषुप्ति दशा, प्रलयदशा और 'न' नकारात्मक जिसमें कुछ भी नहीं है—ऐसी अभावरूप समाधिदशा में शून्य आकाश के सदृश स्मर्यमाण होने कारण परमार्थतः अनात्मरूप वेद्यभाव ही 'अहम्' आत्मरूप होने से भासता है । १. नाभावो भाव्यतामेति न च तन्नास्त्यमूढता । यतोऽभियोगसंस्पर्शात्तदासीदितिनिश्चयः ॥ भावना का विषय अभाव तीनों कालों में भी नहीं हो सकता है, अभाव भावना की स्थिति तो जडता की ही स्थिति है जिससे कि योगी को समाधि से उठने के बाद अभिलाप भाषण के साथ संपर्क हो जाने पर मन में ज्ञान होने लगता है कि मेरी अवस्था थी वह तो शून्य सी निश्चय होने लगती है । चिति-शक्ति का उसी प्रकार का स्वभाव नहीं है; क्योंकि चिति-शक्ति तो सर्वोदिता स्वभाववाली होती है उसमें मूढता की स्थिति की भाँति स्मरण नहीं होता । वह तो सदैव एकरस, अखण्ड, देदीप्य- मान रूप में रहनेवाली होने के कारण प्रति समय अनुभव करनेवाला अनुभव स्मरण स्वातन्त्र्य-शक्ति के रूप में करता रहता है । अभाव भावना का विषय है । इस प्रकार कि अभाव ब्रह्मवादियों का मानना है । तथा माध्यमिक शाखा के बौद्धों का सर्वाभाव अर्थात् •सर्वशून्यरूप है । जब कि इस अवस्था में रहनेवाला आत्मतत्त्व अभाव में मिल जाता है—ऐसा मानना युक्ति युक्त नहीं है । यदि अभाव ब्रह्मवाद के अनुसार आत्मा का वास्तविक स्वरूप अभाव मान कर उससे किसी भी प्रकार की सत्ता के अनस्तित्व का सिद्धान्त स्वीकारलिया जाये तो एक बाधा उपस्थित होती है । वह यह है कि अभाव अवस्था में किसी की वेदन सत्ता का अस्तित्व शेष न रहने के कारण उस अभाव अवस्था का अनुभव कौन करेगा ? ऐसे अभाव से कारणरूप सत् जगत् का उदय कैसे हो सकेगा; क्योंकि असत् तो जड आकाश पुष्प के समान है उससे फिर उत्पत्ति कैसे बन पायेगी अर्थात् असत् से सत् की उत्पत्ति होना कदापि संभव नहीं है और न ऐसा तर्क करना ही ठीक है । 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ २।१६ गीता सद्रूप का अभाव कभी भी नहीं हो सकता एवं असद्रूप का भाव ही होता है; क्योंकि तत्त्व- दर्शी लोगों ने दोनों को बड़ी सूक्ष्मता से देख कर प्रतिपादन किया है कि 'इदमित्थम्' यह ऐसा ही है । अतस्तत्कृत्रिमं सेयं सौषुप्तपदवत्सदा । न त्वेवं स्मर्यमाणत्वं तत्तत्त्वं प्रतिपद्यते ॥ जो पशु प्रमाताओं को अभाव की भावना समाधि होती है वह तो मात्र [ सुषुप्ति ] तामसिक निद्रा के सदृश कृत्रिम ही है । वह तत्त्व [ चिद्रूप ] इस जडभावना के समान कदापि स्मर्यमाण का विषय नहीं हो सकता है—अर्थात् अभाव भावना का साक्षात्कार करनेवाले किसी को इस भूमिका का लाभ हो जायें, तो भी अनुभूति तो तन्द्रा जैसी ही होती है । इसलिए अनित्य, कृत्रिम उसे मानना चाहिए । एवं आत्मा का स्वरूप अनवच्छिन्न 'त्रिकाल बाध्यत्वम्' अर्थात् जिसका तीनों कालों में भी बाध नहीं हो सकता है, इस युक्ति से सिद्ध है । इस स्वरूप की सतत गुरु परम्पराक्रमपूर्वक उपासना करते रहना चाहिए ।