ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 296, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-३, आ.-१, का.-८ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २७३ पूर्वोक्तयुक्तिबलेन यदेतदैश्वर्यमुक्तं तस्य या प्रकाशिका परमेश्वरशक्तिः—यद्वशात् केचिदेव ता युक्तीरादृत्य तदाश्वस्तहृदयाः कृतिनो भवन्ति—सा विद्याशक्तिः । अयमेव षडर्धसारादिदृष्टोऽप्य- स्याचार्यस्य हृदयमावर्जयति पक्षः, 'अन्ये' इत्यनुक्तेः । एतदानन्तर्यौचित्येन च मायातत्त्वनिरू- पणात् । तदाह— ・・・・・・・・・・・・तिरोधानकरी मायाभिधा पुनः ॥ ७ ॥ मायाशक्तिः पुनरचिद्रूपे शून्यादौ प्रमातृताभिमानं प्ररूढं दधती भावानपि चिन्मयान् भेदेनाभिमानयन्ती सर्वथैव स्वरूपं तिरोधत्ते आवृणुते विमोहिनी सा । तिरोधानमत्र न विलय- रूपं मन्तव्यं, यत् कृत्यपञ्चकमध्य आगमेषु गण्यते, दीक्षितस्यापि गुरुमन्त्रादिनिन्दनप्रायमपि त्वावरणमेव ॥ ७ ॥ तिरोधानमावरणरूपं स्फुटयति— भेदे त्वेकरसे भातेऽहंतयानात्मनीक्षिते । शून्ये बुद्धौ शरीरे वा मायाशक्तिर्विजृम्भते ॥ ८ ॥ कही हुई युक्ति के बल से ऐश्वर्य कहा गया है । उसका प्रकाश करनेवाली पारमेश्वरी-शक्ति है, जिसके सामर्थ्य से कोई-कोई जन ही उन युक्तियों का आदर कर, आश्वस्त हृदय होकर कृतकृत्य [ निष्कल-प्रमाता ] हो जाते हैं—वही विद्या-शक्ति है । यही पक्ष त्रिक शास्त्र के द्वारा देखा गया है जो कि आचार्य के हृदय को अत्यधिक आकर्षित करनेवाला है जिस कारण से 'अन्ये' ऐसा कहा नहीं है । इसके अनन्तर ही मायातत्त्व का निरूपण करना उचित माना जाता है । इसके लिए कहते हैं— ・・・・・'इसी को तिरोधान करनेवाली माया-शक्ति के नाम से कहा जाता है ॥ ७ ॥ अचिद्रूप शून्यादि में प्ररूढरूप से प्रमातृता का अभिमान बढ़ाती हुई, भाव-पदार्थों को भी भेदपूर्वक चिन्मयरूप में करती हुई सब प्रकार से संवित् स्वरूप को आवृत्त कर देनेवाली माया- शक्ति समस्त-प्रपञ्चजाल को विमुग्ध कर डालती है । इसमें तिरोधान कर देने का अर्थ विलयरूप नहीं लेना होगा कि जिसमें समस्त वस्तु-पदार्थ क्षत-विक्षत हो जायें, किन्तु विशेषरूप में जिस परम चिद्रूप में लय अर्थात् अपने स्वरूप में आत्मसात् कर लेना है, जिसकी गणना आगमों में कृत्यपञ्चक के मध्य संहार शब्द से की गयी है । दीक्षा से दीक्षित हुए लोगों का भी गुरु मन्त्रादि के विषय में निन्दादि करना केवल आवरण ही माना जाता है ॥ ७ ॥ उसी आवरणरूप तिरोधान को स्पष्ट करते हैं— किन्तु एकरस चिद्रूप में भेदपूर्वक बोध होने पर अनात्मतत्त्व में अहंरूप से प्रतीति होने लगती है । शून्य, प्राण, बुद्धि अथवा शरीरादि प्रमाताओं में माया-शक्ति का उल्लास उद्गम होता है ॥ ८ ॥ ३५