ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-३, आ.-१, का.-७ शुद्धविद्या विद्येश्वराणाम् ॥ ६ ॥ परे प्राहुः—भगवतः परमशिवस्याप्ररूढभेदावभासनं सदाशिवेश्वरता । तत्रास्फुटत्वे इच्छाशक्तिरीश्वरस्य व्यापार्यते, स्फुटत्वे ज्ञानशक्तिः, प्ररूढे तु भेदे ग्राह्यविपर्यासैऽपि ग्राहक- चिन्मात्रतायां विद्येश्वरेषु क्रियाशक्तिः, ग्राहकग्राह्यविपर्यासद्वयप्ररूढौ तु मायाशक्तिः, सा च पशुप्रमातृषु, ग्राहकग्राह्योभयविपर्याससंस्कारे तु अविनिवृत्तेऽपि यदेतत् वस्तुपरमार्थप्रथनं तत्र विद्याशक्तिव्यापारो योगिज्ञानिप्रभृतिष्वपशुप्रमातृषु; तदेतद्दर्शयति— तस्यैश्वर्यस्वभावस्य पशुभावे प्रकाशिका । विद्याशक्तिः..................................... 'पशुभावे' विपर्यासैकरसत्वलक्षणे पाशनीयत्वेऽस्वतन्त्रे दृश्यद्रष्टृदर्शनभेदे सत्यपि जाते शुद्धविद्या है ॥ ६ ॥ दूसरे लोगों का कहना है कि भगवान् परम् शिव का अप्ररूढरूप से भेदपूर्वक भासित होना ही सदाशिवता और ईश्वरता मानी जाती है। उसमें अस्फुट दशा रहने पर ईश्वर की इच्छा- शक्ति व्यापार करती है तथा स्फुट होने पर ज्ञान-शक्ति व्यापार करती है, भेद की प्ररूढदशा में तो ग्राह्य [ प्रमेय ] का विपर्यास हो जाने पर भी ग्राहक [ प्रमाता ] की शुद्धचिन्मात्रता में विद्येश्वर लोगों की क्रिया-शक्ति का व्यापार रहता है, ग्राह्य और ग्राहक इन दोनों का विपर्यास प्ररूढ हो जाने पर तो माया-शक्ति व्यापार करती है और वह विशेषरूप से पशुप्रमाताओं में, ग्राह्य एवं ग्राहक इन दोनों के विपर्यास संस्कार में तो अविनिवृत्त होने पर भी, जिस वस्तु परमार्थ का फैलाव अर्थात् प्रकाश, उन पशुप्रमाताओं से व्यतिरिक्त योगिजनों में विद्या-शक्ति व्यापार करती है, इसको दिखाते हैं— उस ऐश्वर्य स्वभाववाले परम शिव का पशुरूप में प्रकाश करनेवाली विद्या-शक्ति मानी जाती हैं............। 'पशुभावे' जो श्लोक में निर्देश है इससे यह व्यक्त होता है कि जिसका विपर्यास कर देना मात्र स्वरूप है जो कि पाश बद्ध एवं अस्वतन्त्र है उसमें दृश्य, द्रष्टा के भेद दिखाने पर भी पहले १. परमेश्वर के स्वातन्त्र्य से उपजीवित होनेवाली विद्येश्वर-शक्ति शुद्धविद्या कहलाती है। इसलिए विद्येश्वर लोगों ने दीक्षा-दान अर्चनादि से ही इसकी प्राप्ति की है। जिसमें 'अहम्' और 'इदम्' अंश इन दोनों का ज्ञान भिन्न-भिन्न रहता है। यद्यपि भेद का आरम्भ यहाँ से हो होता है तथापि भेद के भीतर अभेद अवस्थित रहता है। इस तत्त्व में क्रिया की प्रधानता होती है। 'मन्त्र' इस तत्त्व का प्रमाता है। इसमें प्रत्यवमर्श 'इदं च अहं च' इस रूप से होता है। विश्व भिन्न है, किन्तु सर्वथा भिन्न नहीं है। इसी कारण इस दशा को 'शुद्धविद्या' कहते हैं। जब कि विद्येश्वर लोग साक्षात् प्रमाता हो होते हैं। इस पर कहा भी है—अधिकारं न चेत्कुर्याद्विद्येशः स्यात्तनुक्षये। यदि अधिकार न करे, तो विद्येश्वर लोग शरीर के क्षीण हो जाने पर शिवस्वरूप हो जाते हैं विद्यातत्त्व में रहने के कारण ईश्वर, सर्वज्ञ इत्यादि विद्येश्वरों को समझे जाते हैं। जैसे पार्थिव ब्रह्माण्ड के अधिपत्ति ब्रह्मा, प्राकृत में विष्णु, मायोय में रुद्र ये कोई दूसरे-दूसरे तत्त्व नहीं हैं तथा परस्पर भिन्न-भिन्न तत्त्व हैं—ऐसा समझना भी नहीं चाहिए।