ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-३, आ.-१, का-६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ २७१ एवमेकेषां मते 'अहम्' इत्याच्छादको यो भागः, तत्प्रथाप्रधाना शुद्धविद्या । अन्ये तु मन्यन्ते, —योऽसाविदंभाग आच्छादनीयस्तस्य यदवभासनं तत्प्रधाना शुद्धविद्या । अन्यथा हि स इदमंशः केन भास्यतां मायायास्तत्राभावात् भावे वा प्ररोहप्रसङ्गात्; अत एवैयं प्ररोहासहिष्णुं यत इदन्तां भासयति ततः शुद्धाभासनाच्च विद्येति । तत एवाप्ररूढमायाकल्पत्वात् महामायेयं श्रीरौरवादिगुरुभिरुपदिष्टा, तदेतदाह— भेदधीरेव भावेषु कर्तुर्बोधात्मनोऽपि या । मायाशक्त्येव सा विद्येत्यन्ये विद्येश्वरा यथा ॥ ६ ॥ मायाप्रमातरि शून्यादिरूपेऽप्यनुल्लसिते, चिन्मात्र एव प्रमातरि कर्तरि च सति चिदेक- रूपेष्वपि भावेषु यदचिद्रूपतया तदप्रकाशनलक्षणं स्वातन्त्र्यं सा शुद्धविद्या माया शक्त्या तुल्या, वेद्यभागे भेदप्रकाशनात् । न च मायैव, ग्राहकस्य चिन्मात्रभागे तावद्विपर्यासनात्, येन प्रकारेण विद्येश्वरा भगवन्तोऽनन्ताद्या वर्तन्ते । ते हि शुद्धचिन्मात्रगृहीताहंभावाः स्वतस्तु भिन्नं वेद्यं पश्यन्ति, यथा द्वैतवादिनामीश्वरः । एवं ग्राहकेऽशतश्चैतन्यरूपात् परमार्थरूपे ग्राह्यविपर्यासिनशक्तिः इस प्रकार कोई तो कहते हैं कि 'अहम्' यह जो आच्छादक भाग है, [ समस्त वेद्यपदार्थों को अपने में आत्मसात् कर लेना और दूसरों की आकांक्षा न रखने के कारण अद्वैतरूप से पूर्ण रहना ही आच्छादक 'अहम्' परामर्श है।] उसको विस्तार करनेवाली शुद्धविद्या कहलाती है । किन्तु इस विषय में दूसरे लोग भी कहते हैं—जो वह इदंभाग आच्छादनीय है उसका आभासन करना है जिसमें शुद्धविद्या का प्राधान्य माना जाता है। नहीं तो, शुद्धविद्या के बिना उस इदंभाग किससे आभासित होगा; क्योंकि मायाप्रमाता का उसमें रहना संभव नहीं है जिससे इदंभाग भासित हो सके । यदि वह रहता तो उसीका विस्तार होता इसलिए विस्तार को न सहनेवाली इदन्ता को जिससे आभासित करती है अर्थात् इदन्ता को प्रकाशित करनेवाली होने से और शुद्ध आभास से आभासित होनेवाली होने के कारण शुद्धविद्या है। इसलिए अप्ररूढ माया के सदृश होने के कारण इसको श्री रौरवादि गुरुजनों ने भी महामाया कहा है, इसको दिखाते हैं— बोधात्मा कर्ता को भेदबुद्धि हो पदार्थों में माया-शक्ति के जैसी भासती है। वही शुद्धविद्या है जैसे कुछ विद्येश्वर लोग [ विद्येश्वर-शक्ति ] शुद्धविद्या मानते हैं ॥ ६ ॥ माया प्रमाता में शून्यादिरूप प्रमाता अनुल्लसित होते हैं, चिन्मात्र ही प्रमाता के कर्ता रहने पर चिद्रूप के साथ पदार्थों की एकता भी हो जाती है जिसका अचिद्रूप से प्रकाशन नहीं होता है वही स्वातन्त्र्यरूप [ भेद प्रकाशरूप माया-शक्ति के जैसा ] शुद्धविद्या है जो कि माया- शक्ति के जैसी रहती है, इससे वेद्य अंश में भेद का प्रकाश होता है। वह माया नहीं है; क्योंकि ग्राहक [ प्रमाता ] के चिन्मात्र भाग में कुछ भी तो उलटा-पलटा नहीं कर सकती, जिस प्रकार से भगवान् विद्येश्वर अनन्तादि हैं, वे लोग शुद्ध संविद्रूप चिन्मात्र में अहंभाव को गृहीत किये हुए अपने से भिन्न वेद्य वस्तु को देखते हैं। जैसे द्वैतवादियों का ईश्वर अर्थात् द्वैत सिद्धान्त को माननेवाले अपने से सर्वथा भिन्न ही ईश्वर को मानते हैं। इस प्रकार ग्राहक [ ज्ञाता ] में चैतन्य अंश से परमार्थरूप ग्राह्य में जो विपरीत भाव का भर देनेवाली शक्ति है वही विद्येश्वरों की