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जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary

श्री गुरु नानक देव जी द्वारा

DevanagariHindipublished56 पृष्ठ

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JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM

नहीं पूछनी। इतने वैभव तथा मान-सम्मान होने के बावजूद भी ऐसा मनुष्य परमात्मा के समक्ष कीटों मे क्षुद्र कीट अर्थात् अत्यंत अधम समझा जाता है, दोषयुक्त मनुष्य भी उसे दोषी समझेंगे। गुरु नानक जी का कथन है कि वह असीम-शक्ति निरंकार गुणहीन मनुष्यों को गुण प्रदान करता है और गुणी मनुष्यों को अतिरिक्त गुणवान बनाता है। परंतु ऐसा कोई और दिखाई नहीं देता, जो उस गुणों से परिपूर्ण परमात्मा को कोई गुण प्रदान कर सके ॥ ७ ॥ सुणिऐ सिध पीर सुर नाथ ॥ सुणिऐ धरत धवल आकास ॥ सुणिऐ दीप लोअ पाताल ॥ सुणिऐ पोहे न सकै काल ॥ नानक भगता सदा विगास ॥ सुणिऐ दूख पाप का नास ॥८॥ परमात्मा का नाम सुनने, अर्थात्-उसकी कीर्ति में अपने हृदय को लगाने के कारण ही सिद्ध, पीर, देव तथा नाथ इत्यादि को परम- पद की प्राप्ति हुई है। नाम सुनने से ही पृथ्वी, उसको धारण करने वाले वृषभ (पौराणिक धर्म ग्रन्थों के अनुसार जो धौला बैल इस भू-लोक को अपने सींगों पर टिकाए हुए है) तथा आकाश के

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