जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)
Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary
श्री गुरु नानक देव जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंJAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM मंने की गत कही न जाए ॥ जे को कहै पिछै पछुताए ॥ कागद कलम न लिखणहार ॥ मंने का बहे करन वीचार ॥ ऐसा नाम निरंजन होए ॥ जे को मंन जाणै मन कोए ॥१२॥ उस अकाल पुरुष का नाम सुनने के पश्चात उसे मानने वाले अर्थात् उसे अपने हृदय में बसाने वाले मनुष्य की अवस्था कथन नहीं की जा सकती। जो भी उसकी अवस्था का बखान करता है तो उसे अंत में पछताना पड़ता है क्योंकि यह सच कर लेना सरल नहीं है, ऐसी कोई रसना नहीं जो नाम से प्राप्त होने वाले आनन्द का रहस्योद्घाटन कर सके। ऐसी अवस्था को यदि लिखा भी जाए तो इसके लिए न कागज़ है, न कलम और न ही लिखने वाला कोई जिज्ञासु, जो वाहिगुरु में लिवलीन होने वाले का विचार कर सकें। परमात्मा का नाम सर्वश्रेष्ठ व मायातीत है। यदि कोई उसे अपने हृदय में बसा कर उसका चिन्तन करे ॥१२ ॥ मंनै सुरत होवै मन बुध ॥ मंनै सगल भवण की सुध ॥ 15 | Page sikhizm.com