जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)
Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary
श्री गुरु नानक देव जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंJAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM मंनै मुहे चोटा ना खाए ॥ मंनै जम कै साथ न जाए ॥ ऐसा नाम निरंजन होए ॥ जे को मंन जाणै मन कोए ॥१३॥ परमात्मा का नाम सुनकर उसका चिन्तन करने से मन और बुद्धि में उत्तम प्रीति पैदा हो जाती है। चिन्तन करने से सम्पूर्ण सृष्टि का ज्ञान-बोध होता है। चिन्तन करने वाला मनुष्य कभी सांसारिक कष्टों अथवा परलोक में यमों के दण्ड का भोगी नहीं होता। चिन्तनशील मनुष्य अंतकाल में यमों के साथ नरकों में नहीं जाता, बल्कि देवगणों के साथ स्वर्ग-लोक को जाता है। परमात्मा का नाम बहुत ही श्रेष्ठ एवं मायातीत है। यदि कोई उसे अपने हृदय में लीन करके उसका चिन्तन करे॥ १३॥ मंनै मारग ठाक न पाए ॥ मंनै पत सिओ परगट जाए ॥ मंनै मग न चलै पंथ ॥ मंनै धरम सेती सनबंध ॥ ऐसा नाम निरंजन होए ॥ जे को मंन जाणै मन कोए ॥१४॥ 16 | Page sikhizm.com