भारतकोश
जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary

श्री गुरु नानक देव जी द्वारा

DevanagariHindipublished56 पृष्ठ

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JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM केती दात जाणै कौण कूत ॥ कीता पसाओ एको कवाओ ॥ तिस ते होए लख दरीआओ ॥ कुदरत कवण कहा वीचार ॥ वारिआ न जावा एक वार ॥ जो तुध भावै साई भली कार ॥ तू सदा सलामत निरंकार ॥१६॥ जिन्होंने प्रभु-नाम का चिन्तन किया है वे श्रेष्ठ संतजन निरंकार के द्वार पर स्वीकृत होते हैं, वे ही वहाँ पर प्रमुख होते हैं। ऐसे गुरुमुख प्यारे अकाल पुरुष की सभा में सम्मान पाते हैं। ऐसे सद्-पुरुष राज दरबार में शोभावान होते हैं। सद्गुणी मानव का ध्यान उस एक सतगुरु (निरंकार) में ही दृढ़ रहता है। यदि कोई व्यक्ति उस सृजनहार के बारे में कहना चाहे अथवा उसकी रचना का लेखा करे तो उस रचयिता की कुदरत का आकलन नहीं किया जा सकता। निरंकार द्वारा रची गई सृष्टि धर्म रूपी वृषभ (धौला बैल) ने अपने ऊपर टिका कर रखी हुई है जो कि दया का पुत्र है (क्योंकि मन में दया-भाव होगा तभी धर्म-कार्य इस मानव जीव से सम्भव होगा।) जिसे संतोष रूपी सूत्र के साथ बांधा हुआ है। यदि कोई परमात्मा के इस रहस्य को जान ले तो वह सत्यनिष्ठ हो 19 | Page sikhizm.com

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