जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)
Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary
श्री गुरु नानक देव जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंJAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM नानक नीच कहै वीचार ॥ वारिआ न जावा एक वार ॥ जो तुध भावै साई भली कार ॥ तू सदा सलामत निरंकार ॥१८॥ इस सृष्टि में असंख्य मनुष्य विमूढ़ तथा गहन अज्ञानी हैं। असंख्य चोर तथा अभक्ष्य खाने वाले हैं, जो दूसरों का माल चुरा कर खाते हैं। असंख्य ही ऐसे हैं जो अन्य लोगों पर जब्र-जुल्म से अत्याचार का शासन करके इस संसार को त्याग जाते हैं। असंख्य अधर्मी मनुष्य जो दूसरों का गला काट कर हत्या का पाप कमा रहे हैं। असंख्य ही पापी इस संसार से पाप करते हुए चले जाते हैं। असंख्य ही झूठा स्वभाव रखने वाले मिथ्या वचन बोलते फिरते हैं। असंख्य मानव ऐसे हैं जो मलिन बुद्धि होने के कारण विष्टा का भोजन खाते हैं। असंख्य लोग दूसरों की निन्दा करके अपने सिर पर पाप का बोझ रखते हैं। श्री गुरु नानक देव जी स्वयं को निम्न कहते हुए फरमाते हैं कि हमने तो कुकर्मी जीवों अर्थात् तामसी व आसुरी सम्पदा वाली सृष्टि का कथन किया है। हे अनन्त स्वरूप ! मैं तुझ पर एक बार भी कुर्बान होने के लायक नहीं हूँ। जो तुझे भला लगता है वही कार्य श्रेष्ठ है। हे निरंकार ! हे पारब्रह्म ! तू सदा शाश्वत रूप हैं॥ १८॥ 23 | Page sikhizm.com