जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)
Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary
श्री गुरु नानक देव जी द्वारा
पृष्ठ 29, कुल 56 में से
संदर्भ में पढ़ेंJAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM थित वार ना जोगी जाणै रुत माहो ना कोई ॥ जा करता सिरठी कओ साजे आपे जाणै सोई ॥ किव कर आखा किव सालाही किओ वरनी किव जाणा ॥ नानक आखण सभ को आखै इक दू इक सिआणा ॥ वडा साहिब वडी नाई कीता जा का होवै ॥ नानक जे को आपौ जाणै अगै गया न सोहै ॥२१॥ तीर्थ-यात्रा, तप-साधना, जीवों पर दया-भाव करके तथा निःस्वार्थ दान देने से ; यदि कोई मनुष्य सम्मान प्राप्त करता है तो वह अति लघु होता है। किन्तु जिन्होंने परमेश्वर के नाम को मन में प्रीत करके सुना व उसका निरन्तर चिन्तन किया है। उन्होंने अपने अंतर के तीर्थ का मानो स्नान कर लिया और अपनी मलिनता को दूर कर लिया। (अर्थात् उस जीव ने अपने हृदय में बसे हुए निरंकार में लीन होकर अपनी अन्तरात्मा की मैल को साफ कर लिया है।) हे सर्गुण स्वरूप ! समस्त गुण आप में हैं, मुझ में शुभ-गुण कोई भी नहीं है। सदाचार के गुणों को धारण किए बिना परमेश्वर की भक्ति भी नहीं हो सकती। हे निरंकार ! तुम्हारी सदा जय हो, तुम कल्याण स्वरूप हो, ब्रह्म रूप हो। तुम सत्य हो, चेतन्य हो और सदैव आनन्द स्वरूप हो। परमात्मा ने यह सृष्टि जब पैदा की थी तब कौन-सा समय, कौन-सा वक्त, कौन-सी तारीख, तथा कौन- 28 | Page sikhizm.com