जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)
Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary
श्री गुरु नानक देव जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंJAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM पाताला पाताल लख आगासा आगास ॥ ओड़क ओड़क भाल थके वेद कहन इक वात ॥ सहस अठारह कहन कतेबा असुलू इक धात ॥ लेखा होए त लिखीऐ लेखै होए विणास ॥ नानक वडा आखीऐ आपे जाणै आप ॥२२॥ सतगुरु जी जन-साधारण के मन में सात आकाश व सात पाताल होने के संशय की निवृति करते हुए कहते हैं कि सृष्टि की रचना में पाताल-दर-पाताल लाखों ही हैं तथा आकाश-दर-आकाश भी लाखों ही हैं। वेद-ग्रंथों में भी यही एक बात कही गई है कि ढूंढने वाले इसको अंतरिम छोर तक ढूंढ कर थक गए हैं किंतु इनका अंत किसी ने नहीं पाया है। सभी धर्म ग्रन्थों में अठारह हजार जगत् होने की बात कही गई है परंतु वास्तव में इनका मूल एक ही परमेश्वर है जो कि इनका स्रष्टा है। यदि उसकी सृष्टि का लेखा हो सके तो कोई लिखे, किंतु यह लेखा करने वाला स्वयं नष्ट हो जाता है। हे नानक ! जिस सृजनहार को इस सम्पूर्ण जगत् में महान कहा जा रहा है वह स्वयं को स्वयं ही जानता है अथवा जान सकता है॥ २२ ॥ 30 | Page sikhizm.com