भारतकोश
जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary

श्री गुरु नानक देव जी द्वारा

DevanagariHindipublished56 पृष्ठ

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JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM सालाही सालाहे एती सुरत न पाईआ ॥ नदीआ अतै वाह पवह समुंद न जाणीअहे ॥ समुंद साह सुलतान गिरहा सेती माल धन ॥ कीड़ी तुल न होवनी जे तिस मनहो न वीसरहे ॥२३॥ स्तुति करने वाले साधकों ने भी उस परमात्मा की स्तुति करके उसकी सीमा को नहीं पाया। जैसे नदियां-नाले समुद्र में मिलकर उसका अथाह अंत नहीं पा सकते, बल्कि अपना अस्तित्व भी खो लेते हैं, वैसे ही स्तुति करने वाले स्तुति करते-करते उसमें ही लीन हो जाते हैं। समुद्रों की शाह, शहंशाह होकर, पर्वत समान धन-सम्पत्ति के मालिक होकर भी, उस चींटी के समान नहीं हो सकते, यदि उनके मन से परमेश्वर विस्मृत नहीं हुआ होता ॥ २३॥ अंत न सिफती कहण न अंत ॥ अंत न करणै देण न अंत ॥ अंत न वेखण सुणण न अंत ॥ अंत न जापै किआ मन मंत ॥ अंत न जापै कीता आकार ॥ अंत न जापै पारावार ॥ अंत कारण केते बिललाहे ॥ 31 | P a g e sikhizm.com