जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)
Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary
श्री गुरु नानक देव जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंता के अंत न पाए जाहे ॥ एहो अंत न जाणै कोए ॥ बहुता कहीऐ बहुता होए ॥ वडा साहिब ऊचा थाओ ॥ ऊचे उपर ऊचा नाओ ॥ एवड ऊचा होवै कोए ॥ तिस ऊचे कओ जाणै सोए ॥ जेवड आप जाणै आप आप ॥ नानक नदरी करमी दात ॥२४॥ उस निरंकार की स्तुति करने की कोई सीमा नहीं तथा कहने से भी उसकी प्रशंसा का अन्त नहीं हो सकता । सृजनहार द्वारा रची गई सृष्टि का भी कोई अन्त नहीं परंतु जब वह देता है तब भी उसका कोई अन्त नहीं है । उसके देखने व सुनने का भी अन्त नहीं है, अर्थात्-वह निरंकार सर्वद्रष्टा व सर्वश्रोता है । ईश्वर के हृदय का रहस्य क्या है, उसका बोध भी नहीं हो सकता । इस सृष्टि का प्रसार जो उसने किया उसकी अवधि अथवा सीमा को भी नहीं जाना जा सकता । उसके आदि व अन्त को भी नहीं जाना जा सकता । अनेकानेक जीव उसका अन्त पाने के लिए बिलखते फिर रहे हैं । किन्तु उस अथाह, अनन्त अकाल पुरुष का अंत नहीं