भारतकोश
जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary

श्री गुरु नानक देव जी द्वारा

DevanagariHindipublished56 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 56 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 35

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM बंद खलासी भाणै होए ॥ होर आख न सकै कोए ॥ जे को खाएक आखण पाए ॥ ओहो जाणै जेतीआ मुहे खाए ॥ आपे जाणै आपे देए ॥ आखह सि भि केई केए ॥ जिस नो बखसे सिफत सालाह ॥ नानक पातसाही पातसाहो ॥२५॥ उसके उपकार इतने अधिक हैं कि उनको लिखने की समर्था किसी में भी नहीं। वह अनेक बख्शिशें करने वाला होने के कारण बड़ा है किंतु उसे लोभ तिनका मात्र भी नहीं है। कई अनगिनत शूरवीर उसकी कृपा-दृष्टि की चाहना रखते हैं। उनकी संख्या की तो बात ही नहीं हो सकती। कई मानव निरंकार द्वारा प्रदत पदार्थों को विकारों हेतु भोगने के लिए जूझ-जूझ कर मर जाते हैं। कई अकाल पुरुष द्वारा दिए जाने वाले पदार्थों को लेकर मुकर जाते हैं । कई मूढ़ व्यक्ति परमात्मा से पदार्थ ले लेकर खाते रहते हैं, कभी उसे स्मरण नहीं करते। कईयों को दुख व भूख की मार सदैव पड़ती रहती है, क्योंकि यह उनके कर्मों में ही लिखा होता है। किन्तु ऐसे सज्जन ऐसी मार को उस परमात्मा की बख्शिश ही 34 | P a g e sikhizm.com

जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद) · पृष्ठ 35, कुल 56 में से · BharatKosha