भारतकोश
जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary

श्री गुरु नानक देव जी द्वारा

DevanagariHindipublished56 पृष्ठ

पृष्ठ 39, कुल 56 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 39

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM

हो रहे हैं। चारों वेद व अठ्ठारह पुराणों में भी उसकी महिमा कही गई है। उनको पढ़ने वाले भी अकाल-पुरुष का व्याख्यान करते हैं । सृष्टिकर्ता ब्रह्मा व स्वर्गाधिपति इन्द्र भी उसके अमूल्य गुणों को कथन करते हैं। गिरिधर गोपाल कृष्ण तथा उसकी गोपियाँ भी उस निरंकार का गुणगान करती हैं। महादेव तथा गोरख आदि सिद्ध भी उसकी कीर्ति को कहते हैं। उस सृष्टिकर्ता ने इस जगत् में जितने भी बुद्धिमान किए हैं वे भी उसके यश को कहते हैं। समस्त दैत्य व देवतादि भी उसकी महिमा को कहते हैं। संसार के सभी पुण्य-कर्मी मानव, नारद आदि ऋषि-मुनि तथा अन्य भक्त जन उसकी प्रशंसा के गीत गाते हैं। कितने ही जीव वर्तमान में कह रहे हैं, तथा कितने ही भविष्य में कहने का यत्न करेंगे। कितने ही जीव भूतकाल में कहते हुए अपना जीवन समाप्त कर चुके हैं। इतने तो हम गिन चुके हैं यदि इतने ही और भी साथ मिला लिए जाएँ। तो भी कोई किसी साधन से उसकी अमूल्य स्तुति कह नहीं सकता। जितना स्व-विस्तार चाहता है उतना ही विस्तृत हो जाता है। श्री गुरु नानक देव जी कहते हैं कि वह सत्य स्वरूप निरंकार ही अपने अमूल्य गुणों को जानता है। यदि कोई निरर्थक बोलने वाला परमेश्वर का अंत कहे कि वह इतना है तो उसे महामूर्खों में अंकित किया जाता है॥ २६ ॥

38 | P a g e sikhizm.com