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जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary

श्री गुरु नानक देव जी द्वारा

DevanagariHindipublished56 पृष्ठ

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JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM परमात्मा न जन्म लेता है और न ही उसका नाश होता है । जिस सृष्टि रचयिता ईश्वर ने रंग-बिरंगी, तरह-तरह के आकार वाली व अनेकानेक जीवों की उत्पत्ति अपनी माया द्वारा की है । अपनी इस उत्पत्ति को कर-करके वह अपनी रुचि अनुसार ही देखता है अर्थात् उनकी देखभाल अपनी इच्छानुसार ही करता है । जो भी उस अकाल पुरुष को भला लगता है वही कार्य वह करता है और भविष्य में करेगा, इसके प्रति उसको आदेश करने वाला उसके समान कोई नहीं है । गुरु नानक जी का फुरमान है कि हे मानव ! वह ईश्वर शाहों का शाह अर्थात् शहंशाह है, उसकी आज्ञा में रहना ही उचित है॥ २७ ॥ मुंदा संतोख सरम पत झोली ध्यान की करह बिभूत ॥ खिंथा काल कुआरी काया जुगत डंडा परतीत ॥ आई पंथी सगल जमाती मन जीतै जग जीत ॥ आदेस तिसै आदेस ॥ आद अनील अनाद अनाहत जुग जुग एको वेस ॥२८॥ गुरु जी कहते हैं कि हे मानव योगी ! तुम संतोष रूपी मुद्राएँ, दुष्कर्मों से लाज रूपी पात्र, पाप रहित होकर लोक-परलोक में बनाई जाने वाली प्रतिष्ठा रूपी चोली ग्रहण कर तथा शरीर को 42 | Page sikhizm.com