जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)
Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary
श्री गुरु नानक देव जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंJAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM प्रभु की नाम-सिमरन रूपी विभूति लगाकर रख । मृत्यु का स्मरण करना तेरी गुदड़ी है, शरीर का पवित्र रहना योग की युक्ति है, अकाल पुरुष पर दृढ़ विश्वास तुम्हारा डण्डा है । इन सब सदाचारों को ग्रहण करना ही वास्तविक योगी भेष है । संसार के समस्त जीवों में तुम्हारा प्रेम हो अर्थात् उनके दुख-सुख को तुम अपना दुख-सुख अनुभव करो, यही तुम्हारा आई पंथ (योगियों का श्रेष्ठ पंथ ) है । काम आदिक विकारों से मन को जीत लेना जगत् पर विजय प्राप्त कर लेने के समान है । नमस्कार है, सिर्फ उस सर्गुण स्वरूप निरंकार को नमस्कार है । जो सभी का मूल, रंग रहित, पवित्र स्वरूप, आदि रहित, अनश्वर व अपरिवर्तनीय स्वरूप है॥ २८ ॥ भुगत ज्ञान दया भंडारण घट घट वाजह नाद ॥ आप नाथ नाथी सभ जा की रिध सिध अवरा साद ॥ संजोग विजोग दुए कार चलावहे लेखे आवहे भाग ॥ आदेस तिसै आदेस ॥ आद अनील अनाद अनाहत जुग जुग एको वेस ॥२९॥ हे मानव ! निरंकार की सर्व-व्यापकता के ज्ञान का भण्डार होना तुम्हारा भोजन है, तुम्हारे हृदय की दया भण्डारिन होगी, क्योंकि 43 | Page sikhizm.com