जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)
Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary
श्री गुरु नानक देव जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंJAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM (कर्मकाण्ड में) धर्मखण्ड का यही नियम है; जो पूर्व पंक्तियों में कथन किया गया है। (गुरु नानक जी) अब ज्ञान खण्ड का व्यवहार वर्णन करते हैं। (इस संसार में) कितने प्रकार के पवन, जल, अग्नि हैं, और कितने ही रूप कृष्ण व रुद्र (शिव) के हैं। कितने ही ब्रह्मा इस सृष्टि में अनेकानेक रूप-रंगों के भेष में जीव पैदा करते हैं। कितनी ही कर्म भूमियों, सुमेर पर्वत, धुव भक्त व उनके उपदेष्टा हैं। इन्द्र व चंद्रमा भी कितने हैं, कितने ही सूर्य, कितने ही मण्डल व मण्डलांतर्गत देश हैं। कितने ही सिद्ध, विद्वान व नाथ हैं, कितने ही देवियों के स्वरूप हैं। कितने ही देव, दैत्य व मुनि हैं और रत्नों से भरपूर कितने ही समुद्र हैं। कितने ही उत्पत्ति के स्रोत हैं (अण्डज-जरायुजादि), कितनी प्रकार की वाणी है (परा, पश्यन्ती आदि) कितने ही बादशाह हैं और कितने ही राजा हैं। कितनी ही वेद-श्रुतियाँ हैं, उनके सेवक भी कितने ही हैं, गुरु नानक जी कहते हैं कि उसकी रचना का कोई अन्त नहीं है; इन सबके अन्त का बोध ज्ञान-खण्ड में जाने से होता है, जहाँ पर जीव ज्ञानयान हो जाता है॥ ३५ ॥ ज्ञान खंड मह ज्ञान परचंड ॥ तिथै नाद बिनोद कोड अनंद ॥ 50 | P a g e sikhizm.com