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जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary

श्री गुरु नानक देव जी द्वारा

DevanagariHindipublished56 पृष्ठ

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM (कर्मकाण्ड में) धर्मखण्ड का यही नियम है; जो पूर्व पंक्तियों में कथन किया गया है। (गुरु नानक जी) अब ज्ञान खण्ड का व्यवहार वर्णन करते हैं। (इस संसार में) कितने प्रकार के पवन, जल, अग्नि हैं, और कितने ही रूप कृष्ण व रुद्र (शिव) के हैं। कितने ही ब्रह्मा इस सृष्टि में अनेकानेक रूप-रंगों के भेष में जीव पैदा करते हैं। कितनी ही कर्म भूमियों, सुमेर पर्वत, धुव भक्त व उनके उपदेष्टा हैं। इन्द्र व चंद्रमा भी कितने हैं, कितने ही सूर्य, कितने ही मण्डल व मण्डलांतर्गत देश हैं। कितने ही सिद्ध, विद्वान व नाथ हैं, कितने ही देवियों के स्वरूप हैं। कितने ही देव, दैत्य व मुनि हैं और रत्नों से भरपूर कितने ही समुद्र हैं। कितने ही उत्पत्ति के स्रोत हैं (अण्डज-जरायुजादि), कितनी प्रकार की वाणी है (परा, पश्यन्ती आदि) कितने ही बादशाह हैं और कितने ही राजा हैं। कितनी ही वेद-श्रुतियाँ हैं, उनके सेवक भी कितने ही हैं, गुरु नानक जी कहते हैं कि उसकी रचना का कोई अन्त नहीं है; इन सबके अन्त का बोध ज्ञान-खण्ड में जाने से होता है, जहाँ पर जीव ज्ञानयान हो जाता है॥ ३५ ॥ ज्ञान खंड मह ज्ञान परचंड ॥ तिथै नाद बिनोद कोड अनंद ॥ 50 | P a g e sikhizm.com

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सरम खंड की बाणी रूप ॥ तिथै घाड़त घड़ीऐ बहुत अनूप ॥ ता कीआ गला कथीआ ना जाहे ॥ जे को कहै पिछै पछुताए ॥ तिथै घड़ीऐ सुरत मत मन बुध ॥ तिथै घड़ीऐ सुरा सिधा की सुध ॥३६॥

ज्ञान खण्ड में जो ज्ञान कथन किया है वह प्रबल है। इस खण्ड में रागमयी, प्रसन्नतापूर्ण व कौतुकी आनंद विद्यमान है।(श्रम खंड में परमेश्वर की भक्ति को प्रमुख माना गया है) परमेश्वर की भक्ति करने का उद्यम करने वाले संतजनों की वाणी मधुर है। वहाँ (श्रम खण्ड में) पर अद्वितीय सुन्दरता वाले स्वरूप की गढ़न की जाती है। उनकी बातों का कथन नहीं किया जा सकता। यदि कोई उनकी महिमा कथन करने की चेष्टा करता भी है तो उसे बाद में पछताना पड़ता है। वहाँ पर वेद-श्रुति, ज्ञान, मन और बुद्धि गढ़े जाते हैं। वहाँ पर दिव्य बुद्धि वाले देवों व सिद्ध अवस्था की प्राप्ति वाली सूझ गढ़ी जाती है॥ ३६॥

करम खंड की बाणी जोर ॥ तिथै होर न कोई होर ॥

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तिथै जोध महाबल सूर ॥ तिन मह राम रहिआ भरपूर ॥ तिथै सीतो सीता महिमा माहे ॥ ता के रूप न कथने जाहे ॥ ना ओह मरह न ठागे जाहे ॥ जिन कै राम वसै मन माहे ॥ तिथै भगत वसह के लोअ ॥ करह अनंद सचा मन सोए ॥ सच खंड वसै निरंकार ॥ कर कर वेखै नदर निहाल ॥ तिथै खंड मंडल वरभंड ॥ जे को कथै त अंत न अंत ॥ तिथै लोअ लोअ आकार ॥ जिव जिव हुकम तिवै तिव कार ॥ वेखै विगसै कर वीचार ॥ नानक कथना करड़ा सार ॥३७॥ जिन उपासकों पर परमेश्वर की कृपा हुई उनकी वाणी शक्तिवान हो जाती है। जहाँ पर ये उपासक विद्यमान होते हैं वहाँ पर कोई और नहीं होता। उन उपासकों में देह को जीतने वाले योद्धा, इन्द्रियों को

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM जीतने वाले महाबली तथा मन को जीतने वाले शूरवीर होते हैं। उन में प्रभु राम परिपूर्ण रहते हैं। उन निर्गुण स्वरूप राम के साथ महिमा रूपी सीता चन्द्रमा समान प्रकाशमान व मन को शीतल करने वाली है। ऐसा स्वरूप प्राप्त करने वालों के गुण कथन नहीं किए जा सकते। वे उपासक न तो मरते हैं और न ही ठगे जाते हैं, जिनके हृदय में परमात्मा राम का स्वरूप विद्यमान होता है। वहाँ कई लोकों के भक्त निवास करते हैं। जिनके हृदय में सत्यस्वरूप निरंकार वास करता है, वे आनंद प्राप्त करते हैं। सत्य धारण करने वालों के हृदय (सचखण्ड) में वह निरंकार निवास करता है; अर्थात् वैकुण्ठ लोक, जहाँ सद्गुणी व्यक्तियों का वास हैं, में वह सर्गुण स्वरूप परमात्मा रहता है। यह सृजनहार परमात्मा अपनी सृजना को रच-रचकर कृपा-दृष्टि से देखता है अर्थात् उसका पोषण करता है। उस सचखण्ड में अनन्त ही खण्ड, मण्डल व ब्रह्माण्ड है। यदि कोई उसके अन्त को कथन करे तो अन्त नहीं पा सकता, क्योंकि वह असीम है। वहाँ अनेकानेक लोक विद्यमान है और उनमें रहने वालों के अस्तित्व भी अनेक हैं। फिर जिस तरह वह सर्वशक्तिमान परमात्मा आदेश करता है उसी तरह वे कार्य करते हैं। अपने इस रचे हुए प्रपंच को देख कर व शुभाशुभ कर्मों को विचार कर वह प्रसन्न होता है। गुरु नानक जी कहते हैं कि उस 53 | P a g e sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM निरंकार के मूल-तत्व का जो मैंने उल्लेख किया है उसे कथन करना अत्यंत कठिन है॥ ३७॥ जत पाहारा धीरज सुनिआर ॥ अहरण मत वेद हथीआर ॥ भओ खला अगन तप ताओ ॥ भांडा भाओ अमृत तित ढाल ॥ घड़ीऐ सबद सची टकसाल ॥ जिन कओ नदर करम तिन कार ॥ नानक नदरी नदर निहाल ॥३८॥ इंद्रिय-निग्रह रूपी भट्ठी हो, संयम रूपी सुनार हो। अचल बुद्धि रूपी अहरन हो, गुरु ज्ञान रूपी हथौड़ा हो। निरंकार के भय को धौंकनी तथा तपोमय जीवन को अग्नि ताप बनाओ। हृदय - प्रेम को बर्तन बनाकर उसमें नाम - अमृत को गलाया जाए। इसी सच्ची टकसाल में नैतिक जीवन को गढ़ा जाता है। अर्थात्-ऐसी टकसाल से ही सद् गुणी जीवन बनाया जा सकता है। जिन पर अकाल पुरुष की कृपा-दृष्टि होती है, उन्हीं को ये कार्य करने को मिलते हैं। हे नानक ! ऐसे सद् गुणी जीव उस कृपासागर परमात्मा की कृपा-दृष्टि के कारण कृतार्थ होते हैं। ॥ ३८ ॥ 54 | P a g e sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM सलोक ॥ पवण गुरू पाणी पिता माता धरत महत ॥ दिवस रात दुए दाई दाया खेलै सगल जगत ॥ चंगिआईआ बुरिआईआ वाचै धरम हदूर ॥ करमी आपो आपणी के नेड़ै के दूर ॥ जिनी नाम धिआया गए मसकत घाल ॥ नानक ते मुख उजले केती छुटी नाल ॥१॥ सलोक ॥ समस्त सृष्टि का गुरु पवन है, पानी पिता है, और पृथ्वी बड़ी माता है। दिन और रात दोनों धाय एवं धीया (बच्चों को खिलाने वाले) के समान हैं तथा सम्पूर्ण जगत् इन दोनों की गोद में खेल रहा है। शुभ व अशुभ कर्मों का विवेचन उस अकाल-पुरुष के दरबार में होगा। अपने शुभाशुभ कर्मों के फलस्वरूप ही जीव परमात्मा के निकट अथवा दूर होता है। जिन्होंने प्रभु का नाम- सुमिरन किया है, वे जप-तप आदि की गई मेहनत को सफल कर गए हैं। गुरु नानक देव जी कथन करते हैं कि ऐसे सद्प्राणियों के मुख उज्ज्वल हुए हैं और कितने ही जीव उनके साथ, अर्थात् उनका अनुसरण करके, आवागमन के चक्र से मुक्त हो गए हैं॥ १॥ 55 | Page sikhizm.com