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जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary

श्री गुरु नानक देव जी द्वारा

DevanagariHindipublished56 पृष्ठ

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JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM निरंकार के मूल-तत्व का जो मैंने उल्लेख किया है उसे कथन करना अत्यंत कठिन है॥ ३७॥ जत पाहारा धीरज सुनिआर ॥ अहरण मत वेद हथीआर ॥ भओ खला अगन तप ताओ ॥ भांडा भाओ अमृत तित ढाल ॥ घड़ीऐ सबद सची टकसाल ॥ जिन कओ नदर करम तिन कार ॥ नानक नदरी नदर निहाल ॥३८॥ इंद्रिय-निग्रह रूपी भट्ठी हो, संयम रूपी सुनार हो। अचल बुद्धि रूपी अहरन हो, गुरु ज्ञान रूपी हथौड़ा हो। निरंकार के भय को धौंकनी तथा तपोमय जीवन को अग्नि ताप बनाओ। हृदय - प्रेम को बर्तन बनाकर उसमें नाम - अमृत को गलाया जाए। इसी सच्ची टकसाल में नैतिक जीवन को गढ़ा जाता है। अर्थात्-ऐसी टकसाल से ही सद् गुणी जीवन बनाया जा सकता है। जिन पर अकाल पुरुष की कृपा-दृष्टि होती है, उन्हीं को ये कार्य करने को मिलते हैं। हे नानक ! ऐसे सद् गुणी जीव उस कृपासागर परमात्मा की कृपा-दृष्टि के कारण कृतार्थ होते हैं। ॥ ३८ ॥ 54 | P a g e sikhizm.com