जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)
Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary
श्री गुरु नानक देव जी द्वारा
JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM निरंकार के मूल-तत्व का जो मैंने उल्लेख किया है उसे कथन करना अत्यंत कठिन है॥ ३७॥ जत पाहारा धीरज सुनिआर ॥ अहरण मत वेद हथीआर ॥ भओ खला अगन तप ताओ ॥ भांडा भाओ अमृत तित ढाल ॥ घड़ीऐ सबद सची टकसाल ॥ जिन कओ नदर करम तिन कार ॥ नानक नदरी नदर निहाल ॥३८॥ इंद्रिय-निग्रह रूपी भट्ठी हो, संयम रूपी सुनार हो। अचल बुद्धि रूपी अहरन हो, गुरु ज्ञान रूपी हथौड़ा हो। निरंकार के भय को धौंकनी तथा तपोमय जीवन को अग्नि ताप बनाओ। हृदय - प्रेम को बर्तन बनाकर उसमें नाम - अमृत को गलाया जाए। इसी सच्ची टकसाल में नैतिक जीवन को गढ़ा जाता है। अर्थात्-ऐसी टकसाल से ही सद् गुणी जीवन बनाया जा सकता है। जिन पर अकाल पुरुष की कृपा-दृष्टि होती है, उन्हीं को ये कार्य करने को मिलते हैं। हे नानक ! ऐसे सद् गुणी जीव उस कृपासागर परमात्मा की कृपा-दृष्टि के कारण कृतार्थ होते हैं। ॥ ३८ ॥ 54 | P a g e sikhizm.com
JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM सलोक ॥ पवण गुरू पाणी पिता माता धरत महत ॥ दिवस रात दुए दाई दाया खेलै सगल जगत ॥ चंगिआईआ बुरिआईआ वाचै धरम हदूर ॥ करमी आपो आपणी के नेड़ै के दूर ॥ जिनी नाम धिआया गए मसकत घाल ॥ नानक ते मुख उजले केती छुटी नाल ॥१॥ सलोक ॥ समस्त सृष्टि का गुरु पवन है, पानी पिता है, और पृथ्वी बड़ी माता है। दिन और रात दोनों धाय एवं धीया (बच्चों को खिलाने वाले) के समान हैं तथा सम्पूर्ण जगत् इन दोनों की गोद में खेल रहा है। शुभ व अशुभ कर्मों का विवेचन उस अकाल-पुरुष के दरबार में होगा। अपने शुभाशुभ कर्मों के फलस्वरूप ही जीव परमात्मा के निकट अथवा दूर होता है। जिन्होंने प्रभु का नाम- सुमिरन किया है, वे जप-तप आदि की गई मेहनत को सफल कर गए हैं। गुरु नानक देव जी कथन करते हैं कि ऐसे सद्प्राणियों के मुख उज्ज्वल हुए हैं और कितने ही जीव उनके साथ, अर्थात् उनका अनुसरण करके, आवागमन के चक्र से मुक्त हो गए हैं॥ १॥ 55 | Page sikhizm.com