जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसिगाल ] १२५ "आनन्द ! करोड़ो कार्षापण फैलाए जाने की सीमा के अन्दर जितने भिक्षु हे, उन सब को गन्धकुटी के आँगन में एकत्र कर ।" बुद्ध ने सोचा कि यदि में केवल उन पाँच सौ भिक्षुओ को बुलवाऊँगा, तो उनके मन में होगा कि शास्ता ने हमारे मन के बुरे विचारो को जान लिया । वे उद्विग्न हो जाएँगे और धर्मोपदेश ग्रहण न कर सकेंगे । इसलिए कहा कि सभी को इकट्ठा कर । "अच्छा भन्ते !" कह स्थविर ने चाबी¹ ले, एक आँगन से दूसरे आँगन घूम, सभी भिक्षुओ को गन्धकुटी के आँगन में इकट्ठा कर बुद्ध के लिए आसन बिछाया । शास्ता बिछे हुए आसन पर पालथी मार, शरीर को सीधा रख वैसे ही बैठे मानो शिला रूपी पृथ्वी पर सुमेरु पर्वत प्रतिष्ठित हुआ हो । बारी बारी करके छह वर्ण की घनी बुद्ध रश्मिएँ निकल रही थी । वह रश्मियाँ भी हाथ जितनी ऊँची हो, छत जितनी ऊँची हो, कंगूरे जितनी ऊँची हो छीज छीज कर आकाश म बिजली की तरह फैली । ऐसा हुआ जैसे समुद्र की कोख को क्षुब्ध करके उसमें से बाल-सूर्य्य निकला हो । भिक्षुसंघ भी शास्ता को प्रणाम करके बडे आदर के साथ उन्हें घेरकर इस प्रकार बैठा जैसे शास्ता लाल कम्बल की कनात से घिरे हुए हो । बुद्ध ने भिक्षुओ को ब्रह्मस्वर से सम्बोधन कर कहा— 'भिक्षुओ, भिक्षु को काम-भोग सम्बन्धी वितर्क, क्रोध सम्बन्धी वितर्क, विहिंसा सम्बन्धी वितर्क—इन तीन बुरे सकल्पो को मन में जगह नही देनी चाहिए। यदि मन में कोई बुरा विचार आ जाए तो उसे छोटा न समझना चाहिए। बुरा विचार शत्रु की तरह होता है । शत्रु कभी छोटा नही होता । मौका मिलन से वह नाश ही कर डालता है । इसी प्रकार थोडा सा भी बुरा विचार यदि उसे बढने का मौका मिले तो महाविनाश कर डालता है । बुरा विचार हलाहल विष की तरह होता है, ऐसे फोडे की तरह होता है, जिसने चमडी और रोएँ उखाड लिए हा, विषैले साँप की तरह होता है, बिजली और आग की तरह होता है । इससे चिमटना ठीक नही । डरते रहना चाहिए । जिस समय पैदा हो ¹ अथापुरन—दरवाजा खोलने का लकडी का कोई औजार ।