जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२६ [ १ १५.१४८ उसी समय ज्ञानबल से अथवा भावनाबल से उसे इस तरह त्याग देना चाहिए जिस तरह कमल के पत्ते पर पड़ी हुई बूंद उसे छोड़ देती है। पुराने पण्डितो ने थोड़े से भी बुरे विचार को असह्य कर उसका इस प्रकार निग्रह कर दिया कि वह फिर पैदा न हो।" इतना कह बुद्ध ने पूर्वजन्म की बात कही— ख. अतीत कथा पुराने समय मे वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व सियार की योनि में पैदा हो जगल मे नदी के किनारे बसने लगे। एक बूढा हाथी गङ्गा के किनारे मर गया। शिकार की खोज में घूमते हुए सियार ने हाथी के शरीर को देखकर सोचा कि मुझे बड़ा शिकार मिला है। उसने सूंड पर जाकर मुंह मारा। ऐसा लगा मानो हल की फाल पर मुंह लगा। यहाँ कुछ खाने योग्य नहीं है, समझ उसने दाँत पर मुँह मारा। ऐसा लगा मानो खम्भे पर मुंह लगा हो। कान पर मुँह मारा। ऐसा लगा मानो छाज के कोने पर मुंह लगा हो। पेट पर मुंह मारा। ऐसा लगा मानो धान की कोठी पर मुंह लगा हो। पैरो पर मुंह मारा। ऐसा लगा मानो ऊखल पर मुंह लगा हो। पूंछ पर मुंह मारा। ऐसा लगा मानो मूसल पर मुंह लगा हो। यहाँ भी कुछ खाने योग्य नहीं है, सोच कही भी कुछ मजा न आने पर उसने गुदा-मार्ग में मुँह मारा। ऐसा लगा मानो नरम नरम पूए हो। उसने सोचा कि अब मुझे इस शरीर में खाने योग्य कोमल जगह हाथ लग गई। उसके बाद से वह खाता हुआ पेट के अन्दर घुस, वहाँ वृक्का, हृदय आदि को खाकर प्यास के समय रक्त पी, लेटने की इच्छा होने पर पेट में ही फैलकर लेटा। यह सोचने लगा कि यह हाथी का शरीर मुझे रहने का सुख देता है इसलिए घर की तरह है, खाने की इच्छा होने पर मास की कमी नही, मुझे किसी दूसरी जगह जाने की क्या आवश्यकता ? वह किसी दूसरी जगह न जा हाथी के पेट में ही मास खाता हुआ रहने लगा। जैसे जैसे समय गुजरता गया ग्रीष्म ऋतु की वायु के तथा सूर्य की किरणो के स्पर्श से वह लाश सूखकर उसम कस कट गए । जिस द्वार से सियार ने प्रवेश किया था, वह दरवाजा बन्द हो गया। पेट में अन्धेरा छा गया। सियार को