भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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गुण ] १६७ "पुराने उत्तरासंग का क्या करेंगे ?" "अन्तरवासक¹ बना लेंगे।" "पुराने अन्तरवासक का क्या करेंगे ?" "बिछावन बना लेंगे।" "पुराने बिछौने का क्या करेंगे ?" "जमीन पर बिछा लेंगे।" "जमीन पर जो पहले बिछाते थे, उसका क्या करेंगे ?" "पाँव-झाड़ने का काम लेंगे।" "पाँव झाड़ने के पुराने कपड़े का क्या करेंगे ?" "महाराज ! जो श्रद्धापूर्वक दिया गया है, वह फेंका नहीं जा सकता । इस लिए पाँव झाड़ने के पुराने कपडे को कुल्हाडी से कूटकर मिट्टी में मिलाकर शयनासन की जगहो पर मिट्टी का लेप करेंगे।" "भन्ते ! आपको दिया हुआ वस्त्र पाँव झाडने का कपडा बनने पर भी फेका नहीं जा सकता ?" "महाराज ! हाँ, हमें दिया फेंका नही जा सकता । उपयोग में ही लाया जाता है।" राजा ने सन्तुष्ट हो प्रसन्नता के मारे घर पर रक्खे दूसरे पाँच सौ वस्त्र भी मँगवा कर स्थविर को दिए । स्थविर ने दान का अनुमोदन किया । उसे सुन स्थविर को प्रणाम कर राजा स्थविर की प्रदक्षिणा कर चला गया । स्थविर ने जो पाँच सौ चीवर पहले मिले थे वह उन भिक्षुओं को बाँट दिए जिनके चीवर पुराने हो गए थे । स्थविर के पाँच सौ शिष्य थे । उनमें एक छोटी आयु का भिक्षु स्थविर की बहुत सेवा करता था । परिवेण में झाडू लगाता । पीने और काम में लाने का पानी लाकर उपस्थित करता । दातुन लाकर देता । मुख धोने तथा स्नान करने के लिए जल देता । पाखाने अग्नि-शाला तथा सोने-बैठने के स्थान को ठीक-ठाक करके रखता । हाथ-पैर दबाना तथा पीठ मलना आदि


¹ नीचे पहनने का चीवर, जैसे धोती ।