जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
पृष्ठ 186, कुल 479 में से
संदर्भ में पढ़ें१६८ [ २.१.१५७ करता। स्थविर ने यह सोच कि इसने मेरा बडा उपकार किया है पीछे मिले सब वस्त्र उसी को देना उचित समझ दे डाले। उसने भी वह सब वस्त्र बांट कर अपने गुरु-भाइयो को दिए। वे सभी भिक्षु जिन्हें वस्त्र मिला वस्त्र के टुकडे टुकडे कर उन्हें रज कर्णिकार पुष्प के सदृश काषाय वस्त्र पहन शास्ता के पास गए। वहां प्रणाम कर एक ओर बैठे भिक्षु कहने लगे- "भन्ते ! क्या श्रोतापन्न आर्य-श्रावक भी मुंह देखकर दान देते है ?" "भिक्षुओ, आर्य-श्रावक मुंह देखकर दान नही देते।" "भन्ते ! हमारे उपाध्याय धर्म-भण्डागारिक स्थविर ने हजार हजार की कीमत के पांच सौ वस्त्र एक ही छोटी आयु के भिक्षु को दे दिए। उसने जो उसे मिले बांट कर हमे दिए।" "भिक्षुओ, आनन्द मुख देखकर दान नही देता। उस भिक्षु ने इसकी बहुत सेवा की। उसने अपने उपकार का प्रत्युपकार करने के विचार से गुणवान होने के ख्याल से, उचित होने से सोचा कि उपकारी का प्रत्युपकार करना चाहिए, और इसी लिए अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए दिए। पुराने पण्डितों ने भी अपना उपकार करने वाले का बदले मे उपकार किया है।" उनके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की बात कही - ख. अतीत कथा पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व सिंह की योनि मे पैदा हो पर्वत-गुफा मे रहते थे। उन्होने एक दिन गुफा से निकल पर्वत के नीचे की ओर देखा। उस पर्वत के चारो ओर बडा भारी तालाब था। उस के एक (तरफ) ऊंची जगह पर कडे दलदल के ऊपर कोमल हरी घास उगी थी। खरगोश, हरिण, और हलके मृग उसके ऊपर विचर कर उसे खाते। उस दिन भी एक मृग उन तिनकों को खाता हुआ घूम रहा था। सिंह उस मृग को पकडने के लिए पर्वत पर से उछल कर मृग की तरफ कूदा ! मृग मरने के भय से डरकर चिल्लाता हुआ भाग गया। सिंह वेग को न रोक सकने के कारण दलदल पर गिरकर नीचे चला गया। उलट न आ सकने के कारण चारो पैर खंभे की तरह हो गए। उसे एक