जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंगिद्ध ] १६७ था । उसने उन गृध्रों को कष्ट में देखकर एक ऐसी जगह पहुँचा दिया जहाँ वर्षा नहीं हो रही थी। फिर वहाँ आग जलवाई। मुर्दा गौ फेंकने के स्थान से गो-मांस मँगवा कर उन्ह दिलवाया। उनकी रक्षा का प्रबन्ध किया। आँधी-पानी के बन्द होने पर गृध्र स्वस्थ शरीर हो पर्वत को ही लौट गए। उन्होने वहाँ इकट्ठे हो, इस प्रकार मन्त्रणा की। 'वाराणसी सेठ ने हमारा उपकार किया। उपकार करने वाले का प्रत्युपकार करना चाहिए। इसलिए अब से तुम म से जिस किसी का जो वस्त्र वा आभरण मिले, उसे चाहिए कि वह वाराणसी-सेठ के घर में खुले आँगन में गिरा दे।' उस समय से गृध्र, आदमियो के धूप में सुखाने के लिए डाले हुए वस्त्रा- भरणों को, उन्हें लापरवाह देख, जिस तरह से चील मांस के टुकड़े को एक दम उठा ले जाती हैं, उसी तरह उठा ले जाकर वाराणसी-सेठ के खुले आँगन में गिरा देते । सेठ ने यह मालूम करके कि यह वस्त्राभूषण गृध्र ला लाकर डालते हैं, उन्हें पृथक एक ओर रक्खा । राजा के पास खबर पहुँची कि गृध्र नगर उजाड़ रहे हैं। उसने कहा कि किसी एक गृध्र को पकड़ लो। सब माल मँगवा लूँगा। राजा ने जहाँ तहाँ जाल और पाश फैलवाए । माता पिता का पोषण करने वाला गृध्र जाल में . फँस गया। उसे पकड़कर राजा को दिखाने के लिए ले चले। वाराणसी-सेठ ने राजा की सेवा में जाते समय उन मनुष्यो को गृध्र पकड़ कर ले जाते हुए देखा। उसने सोचा कि यह इस गृध्र को कष्ट न दें, इसलिए साथ हो लिया। गृध्र को राजा के पास ले गए। राजा ने पूछा— "तुम नगर पर छापा डालकर वस्त्र आदि ले जाते हो ?" "महाराज ! हाँ ।" "वह किसे दिए है ?" "वाराणसी-सेठ को ।" "क्यो ?" "हमें उसने जीवन-दान दिया था। उपकार करने वाले का प्रत्युपकार करना चाहिए। इसलिए दिए।" राजा ने उसे यह कहते हुए कि गृध्र तो सौ योजन की दूरी से लाश को