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देख लेते हैं, तूने अपने लिए फैलाए फंदे को क्यो नहीं देखा, (यह) पहली गाथा
कही—
यं ननु गिज्झो योजनसतं कुणपानि अवेक्खति,
कस्मा जालं च पासं च आसज्जापि न बुज्झसि ॥
[ गृध्र तो सौ योजन दूरी पर से भी लाश को देख लेता है। तू पास से
भी जाल और फंदे को क्यो नहीं देख सका ? ]
यं निपात मात्र है। नु, निपात ही है। गिज्झो योजनसतं (गृध्र सौ
योजन) दूर पर पड़ी हुई कुणपानि अवेक्खति देखता है। आसज्जापि, पास
आकर भी, पहुँच कर भी, तू अपने लिए फैलाए जाल और फंदे के पास पहुँच
कर भी उसे क्यो न बुज्झसि (यह) पूछा।
गृध्र ने उसकी बात सुन दूसरी गाथा कही—
यदा पराभवो होति पोसो जीवितसङ्खये,
अथ जालं च पासं च आसन्नापि न बुज्झति ॥
[ जब विनाश का समय आता है, जब जीवन पर सङ्कट आता है, तब
प्राणी पास में पड़े हुए जाल और फंदे को भी नहीं देखता ।]
पराभवो, विनाश। पोसो, प्राणी।