भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

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२०० [ २.२.१६५ तथा समापत्तियाँ प्राप्त कर फल-मूल चुग चुग कर खाते हुए हिमालय-प्रदेश में रहने लगे। उनके चङ्क्रमण करने के स्थान के एक सिरे पर धाम्बी में एक नेवला और उसीके पास वृक्ष की खोह मे एक सर्प रहता था। वह दोनो नेवला और साँप हमेशा आपस में झगडते रहते थे। बोधिसत्त्व ने उनको झगड़ने का दुष्परिणाम और मैत्री-भावना का लाभ समझा कर कहा कि कलह न करके मिलकर रहना चाहिए। इस प्रकार उन दोनो का मेल करा दिया। साँप के बाहर निकलने के समय नेवला चङ्क्रमण-भूमि के सिरे पर बांबी के द्वार में से सिर निकाल मुंह खोल श्वास-प्रश्वास लेता हुआ लेट कर सो रहा। बोधिसत्त्व ने उसे इस प्रकार सोते हुए देख 'तुझे किस कारण से भय लगा है ?' पूछते हुए यह पहली गाथा कही— सन्धिं कत्वा अमित्तेन अण्डजेन जलाबुज ! विवरिय दाढं सयसि कुतो तं भयमागतं ॥ [ हे नकुल ! तू सांप से दोस्ती करके भी मुंह खोले पड़ा है। तेरे भयभीत होने का क्या कारण है ? ] ————— सन्धि कत्वा मैत्री करके, अण्डजेन, अण्डे से पैदा हुए नाग से, जलाबुज¹ ! नकुल को पुकारता है। वह गर्भ से पैदा होने के कारण जलाबुज कहलाया। विवरिय, खोलकर। ————— इस प्रकार बोधिसत्त्व के कहने पर नेवला बोला—आर्य्य ! शत्रु की ओर से असावधान नही होना चाहिए। सशंकित ही रहना चाहिए। यह कहते हुए नेवले ने दूसरी गाथा कही— सङ्केथेव अमित्तस्मिं मित्तस्मिं पि न विस्ससे अभया भयमुप्पन्नं अपि मूलं निकन्तति ॥ ————— ¹ ज्राबुज (=जरायुज)