भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

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उपसाळ्हक ] २०१ [ शत्रु से सशङ्कित रहे। मित्र पर भी विश्वास न करे। अभय से जो भय पैदा होता है वह जड़ भी खोद देता है।] अभया भयमुप्पन्न यहाँ से तुझे भय नहीं है, ऐसा अभय (देने वाला) कौन है ? मित्र ! मित्र मे भी विश्वास करने पर उससे जो भय उत्पन्न होता है, वह जड़ भी खोद देता है। मित्र को सब छिद्र मालूम होते हैं, इसलिए वह जड़ खोदने का काम करता है। बोधिसत्त्व ने कहा—"डर मत। मैने ऐसा वर दिया है कि सर्प अब तुझसे द्वेष नहीं करेगा। तू अब से उससे सशङ्कित मत रह।" इस प्रकार उपदेश दे, चारो ब्रह्म विहारो की भावना कर बोधिसत्त्व ब्रह्मलोकगामी हुए। वे भी कर्मानुसार (परलोक) सिधारे। शास्ता ने यह धर्मोपदेश दे जातक का मेल बैठाया। उस समय सर्प और नेवला यह दोनो प्रधान थे। तपस्वी तो मैं ही था। १६६. उपसाळ्हक जातक उपसाळ्हक नामानं, यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय उप- साळ्हक नाम के एक ब्राह्मण के बारे में जिसे श्मशान की शुद्धि का बहुत ख्याल था कही। क. वर्तमान कथा वह ब्राह्मण बड़ा धनवान् था। लेकिन क्योंकि वह एक मिथ्या-मत का शिकार था, इसलिए वह पास के विहार में रहने वाले बुद्धो की भी सेवा नहीं करता था। हाँ, उसका पुत्र पण्डित था, ज्ञानी था।

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