जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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✓ १८६. दधिवाहन जातक
“वण्णगन्धरसूपेतो...” यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय विरोधी पक्ष का साथ देने वाले के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
जो कथा पहले आ चुकी है, १ वैसी ही कथा है। शास्ता ने कहा- “भिक्षुओ ! बुरे की संगत बुरी होती है, अनर्थकारी होती है। मनुष्यों के लिए कुसंगति के दुष्परिणाम का क्या कहना ? पूर्व समय में अस्वादिष्ट, अमधुरै नीम के वृक्ष की संगति के कारण मधुर-रस वाला, दिव्य-रस वाला, जड, आम का वृक्ष भी अमधुर, कडुआ हो गया ।” इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय काशी राष्ट्र में चार ब्राह्मण भाई ऋषियो के प्रव्रज्या क्रम से प्रव्रजित हो, हिमवन्त प्रदेश में क्रम से पर्णशालाएँ बना रहने लगे। उनमें से जो ज्येष्ठ था वह मर कर शक्र देवता हुआ। इस बात को जान वह बीच बीच में सातवें आठवे दिन अपने उन भाइयो की सेवा में आता। एक दिन उसने ज्येष्ठ तपस्वी को प्रणाम कर एक ओर बैठ पूछा- “भन्ते ! आपको किस चीज की जरूरत है ?” पाण्डु-रोग से पीडित तपस्वी ने कहा- “मुझे आग की जरूरत है।” उसने उसे छुरी-कुल्हाडी दी। यह छुरी-कुल्हाडी दस्ते के हिसाब से जैसे दस्ता
• 'देखो गिरिदत्त जातक (१८४)