जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदधिवाहन ] २६३ डाला जाता छुरी भी बन जाती, कुल्हाडी भी बन जाती। तपस्वी ने पूछा— "इसे लेकर कौन मेरे लिए लकडियां लाएगा ?" शक्र ने कहा—"भन्ते ! जब आपको लकडी की जरूरत हो, इस कुल्हाडी को हाथ से रगड़ कर कहें, जाओ मेरे लिए लकडियां ला कर आग बना दो। यह लकडियां लाकर आग बना देगी।" उसे छुरी-कुल्हाडी दे दूसरे से भी जाकर पूछा—"भन्ते ! तुम्हें क्या चाहिए ?" उसकी पर्णशाला के पास से हाथियो के आने जाने का रास्ता था। उसे हाथियो का उपद्रव था। इसलिए उसने कहा—"मुझे हाथियो के कारण दुख होता है। उन्हे भगा दें।" शक्र ने उसे एक ढोल लाकर दिया और कहा कि इस ओर बजाने से तुम्हारे शत्रु भाग जाएंगे, और इस ओर बजाने से मैत्री भाव युक्त हो चारो प्रकार की सेना सहित तुम्हारे पास आ जाएंगे। इतना कह और वह ढोल दे छोटे भाई के पास जा पूछा—"भन्ते ! तुम्हे क्या चाहिए ?" उसकी भी पाण्डुरोग की प्रवृत्ति थी। इसलिए उसने कहा कि मुझे दही चाहिए। शक्र ने उसे एक दही का घड़ा दिया और कहा—"यदि तुम्हारी इच्छा हो तो इसे उलटना। उलटने पर यह महानदी बहाकर, बाढ़ लाकर तुम्हें राज्य भी लेकर दे सकेगा" इतना कह कर इन्द्र चला गया। उस समय से छुरी-कुल्हाडी ज्येष्ठ भाई के लिए आग बना देती। दूसरा जब ढोल बजाता तो हाथी भाग जाते। छोटा दही खाता। उस समय किसी उजडे हुए गाँव की जगह पर घूमते हुए एक सूअर ने एक दिव्य मणि-खण्ड देखा। उसने उस मणि-खण्ड को मुंह से उठा लिया। उसके प्रताप से वह आकाश में ऊँचे उड़ा। वहाँ से उसने समुद्र के बीच में एक द्वीप पर पहुँच सोचा—मुझे यहाँ रहना चाहिए। इसलिए वहाँ उतर एक गूलर के वृक्ष के नीचे सुख पूर्वक रहने लगा। एक दिन वह उस वृक्ष के नीचे उस मणि-खण्ड को अपने सामने रख सो गया। काशी राष्ट्र का एक आदमी, जिसे उसके माता पिता ने निकम्मा समझ घर से निकाल दिया था, एक पत्तन गाँव पर पहुँचा। वहाँ उसने नाविको के पास नौकरी की। नौका पर चढ कर जा रहा था कि समुद्र के बीच में नौका टूट गई। वह एक लकडी के तख्ते पर बैठा उस द्वीप में पहुँचा। वहाँ फलमूल