भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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दधिवाहन ] २६५ छुरी-कुल्हाड़ी पर हाथ फेर उसे आज्ञा दी कि जाकर राजा का सिर ले आए। छुरी-कुल्हाड़ी ने जाकर राजा का सिर ला पैरो पर रख दिया। एक भी आदमी हथियार न उठा सका। उसने बड़ी सेना के साथ नगर में प्रवेश कर, अभिषेक करवा, दधिवाहन नाम से धर्मपूर्वक राज्य किया। एक दिन यह महानदी में जाल की टोकरी फेंक कर खेल रहा था। कण्ण- मुण्ड सरोवर से देवताओ के उपभोग में आने वाला एक पका आम आकर जाल में लगा। जाल उठाने वालो ने उसे देख कर राजा को दिया। वह बड़ा था, घड़े के प्रमाण का था, गोलाकार था, सुनहरी रंग का था। राजा ने बनचरो से पूछा—"यह किसका फल है ?" उन्होने बताया—आम्रफल। राजा ने उसे खाकर उसकी गुठली अपने उद्यान में लगवा, उसे दूध-पानी से सिंचवाया। पेड़ लगकर उसने तीसरे वर्ष फल दिया। आम के पेड़ का बहुत सत्कार होने लगा। दूध-पानी से उसे सींचते, सुगन्धित द्रव्यो के पञ्चाङ्गुलि-चिन्ह लगाते, और मालाओ के जाल पवते। सुगन्धित तेल के दीपक जलाते। यह कीमती कपडे की कनातो से घिरा रहता। इसके फल मधुर तथा सुनहरी रंग के होते। जब दधिवाहन राजा दूसरे राजाओ के पास आम के फल भेजता तो इस डर से कि कही गुठली से पेड न लग जाए वह अंकुर निकलने की जगह को कांटे से बींध देता। वे आम खाकर गुठली को रोपते। पेड़ न लगता। उन्होने पूछा तो पता लगा कि क्या कारण है ? एक राजा ने अपने माली को बुलाकर पूछा कि क्या वह दधिवाहन राजा के आमो के रस को नष्ट कर उन्हें कडुवा बना सकेगा ? उसने कहा—देव ! हाँ। "तो जा" कह, उसे हजार देकर विदा किया। उसने वाराणसी पहुँच राजा के पास खबर भिजवाई कि एक माली आया है। राजा न उसे बुलवाया। उसने जा राजा को प्रणाम कर "तू माली है ?" पूछने पर कहा—"देव ! हाँ" और अपनी योग्यता का बखान किया। राजा ने आज्ञा दी—जा हमारे माली के साथ रह। उस समय से वह दोनो जने बाग की सार संभाल रखते। नए माली ने अकाल-फूल फुला कर और अकाल-फल लगाकर उद्यान को रमणीय बना दिया।