भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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२६६ [ २४।१८६ राजा ने उस पर प्रसन्न हो पुराने माली को निकाल उसीको उद्यान सौंप दिया। उसने उद्यान को अपने हाथ में जान, आम के वृक्ष के चारो ओर नीम और कडवी लताएँ लगा दीं। क्रम से नीम के वृक्ष बढे। जडो से जडें तथा शाखाओ से शाखाएँ इकट्ठी हो एक दूसरे में मिल गईं। उनके अस्वादिष्ट अमधुर रस के ससर्ग से वैसा मधुर फल वाला आम कडुवा हो गया। उसका रस नीम के पत्ते जैसा हो गाय। यह देख कि आम के फल कडुवे हो गए, माली भाग गया। दधिवाहन ने उद्यान में जाकर आम का फल खाँया, तो मुँह में डाला हुआ आम का रस उसे नीम की तरह कसैला लगा। उसे सहन न कर सकने के कारण, उसने खखार कर थूक दिया। उस समय बोधिसत्त्व उस राज के अर्थधर्मानुशासक थे। राजा ने बोधि- सत्त्व को बुलाकर पूछा— "पण्डित ! इस वृक्ष की जो सेवा पहले होती थी, वह अब भी होती है। ऐसा होने पर भी इसका फल कडवा हो गया है। क्या कारण है ?" ऐसा कहते हुए राजा ने पहली गाथा कही— वण्णगन्धरसूपेतो अम्बाय अहूदा पुरे, तमेव पूज लभमानो केनम्बो कटुकप्फलो ॥ [यह आम पहले वर्ण और रस से युक्त था। इसकी वही सेवा होती है, तो भी इसका फल कैसे कडुवा हो गया।] इसका कारण बताते हुए बोधिसत्त्व ने दूसरी गाथा कही— पुचिमन्दपरिवारो अम्बो ते दधिवाहन ! मूल मूलेन ससट्ठ साखा साखा निसेवरे असातसन्निवासेन तेनम्बो कटुकप्फलो ॥ [हे दधिवाहन ! तेरा आम्र-वृक्ष नीम से घिरा है। उसकी जड जड से तथा शाखाएँ शाखाओं से सटी हैं। कडुवे के साथ होने से आम का फल कडुवा हो गया।] पुचिमन्दपरिवारो, नीम के वृक्ष से घिरा हुआ साखा साखा निसेवरे, पुचिमन्द की शाखाएँ आम की शाखाओं को घेर हैं। असातसन्निवासेन अमधुर