भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

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चुल्लपदुम ] [Page Header Left] २८१ [Page Header Right]

जा, उसे उठा आश्रम पर ला, काषाय से धो लेप कर उसके जखमो की चिकित्सा की। उसकी भार्य्या घृणा से उस पर थूकती हुई फिरती थी—इस प्रकार के लुञ्जे को गङ्गा से लाकर उसकी सेवा करते हैं ।।। उसके जखम ठीक होने पर बोधिसत्त्व उसे और अपनी भार्य्या को आश्रम पर छोड़, जगल से फलमूल लाकर उसका तथा भार्य्या का पालन करने लगे। उनके इस प्रकार रहते हुए वह स्त्री उस लुञ्जे से आकृष्ट हो गई। उसने उसके साथ अनाचार किया। फिर किसी उपाय से बोधिसत्त्व को मार डालना चाहिए, सोच बोली—"स्वामी ! मैने, तुम्हारे कन्धे पर बैठे हुए जिस समय कान्तार से निकल रही थी इस पर्वत को देख कर एक मिन्नत मानी थी— हे पर्वतनिवासी देवता ! यदि मैं और मेरा स्वामी सकुशल जीते निकल जाएंगे तो मैं तुम्हारी बलि चढाऊँगी। सो, वह देवता जिसकी मिन्नत मानी थी तग करता है। उसकी बलि दे।" बोधिसत्त्व उसकी माया नही जानते थे। उन्होने 'अच्छा' कह स्वीकार किया, और बलिकर्म तैयार कर उससे बलि-पात्र उठवा पर्वत पर चढे। उस स्त्री ने बोधिसत्व से कहा—"स्वामी ! देवता से भी बढकर तुम ही उत्तम देवता हो। इसलिए पहले तुम्हें ही वन-पुष्पों से पूज, प्रदक्षिणा कर, वन्दना कर पीछे देवता की बलि दूँगी।" उसने बोधिसत्त्व को प्रपात की ओर कर वन-पुष्पों से पूजा की। फिर प्रदक्षिणा कर, प्रणाम करने वाली की तरह हो, पीछे जा, पीठ में धक्का दे, प्रपात से गिरा दिया। 'शत्रु की पीठ देख ली' सोच सन्तुष्ट हो, वह पर्वत से उतर लुञ्जे के पास गई। बोधिसत्त्व भी प्रपात के किनारे से पर्वत से गिरते हुए, एक गूलर के वृक्ष पर पत्तो से ढके कष्टकररहित गुच्छ में जा लग। पर्वत से नीचे उतरने में असमर्थ थे। वह गूलर खाकर शाखाओ के बीच में बैठे रहे। एक गोह, जिसका शरीर बडा था पर्वत के नीचे से उस गूलर के पेड़ पर चढ फल खाता था। वह उस दिन बोधिसत्त्व को देखकर भाग गया। अगल दिन आया और एक ओर से फल खाकर चला गया। इस प्रकार बार बार आने से जब वह बोधिसत्त्व का विश्वासी हो गया तो उसने पूछा—"तं इस जगह कैसे आया ?" "इस कारण से" बताने पर उसने कहा—"तो मत डर।" उसने बोधिसत्त्व को अपनी पीठ पर लिटा, उतार कर जगल से निकल, महामार्ग

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