भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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२८२ [ २५.१६३ पर ले जाकर कहा—"इस मार्ग से जा।" बोधिसत्त्व को उत्साहित कर वह स्वयं जगल में चला गया। बोधिसत्त्व एक गामडे में जाकर रहने लगे। वहाँ रहते हुए, पिता के मरने का समाचार मिला। वह वाराणसी पहुँच, कुलागत राज्य पर अधिकार कर, पदुमराजा नाम से, दस राजधर्मों से विरुद्ध न जा धर्म से राज्य करने लगे। चारो नगर-द्वारो पर, नगर के बीच में तथा महल के द्वार पर छ दानशालाएँ बनवा प्रति दिन छ हजार खर्च कर दान देते। वह पापी स्त्री भी उस लुञ्जे को कन्धे पर बिठा जगल से निकल बस्तियो मे भिक्षा मांग कर यागु-भात इकट्ठा कर उस लुञ्जे को पोसती थी। उससे यदि कोई पूछता कि यह तेरा क्या लगता हैं, सो वह उत्तर देती—"मैं इसके मामा की लडकी हूँ और यह मेरी बुआ का लडका है। मैं इसीको दी गई। सो में अपने स्वामी को—जो इस तरह दण्डित भी किया गया है—उठाए लिए फिर कर, भीख मांग कर पालती हूँ।" मनुष्यों ने समझा—यह पतिव्रता है। उसके बाद और भी यवागु भात देने लगे। दूसरो ने कहा—"तू इस तरह मत घूम। पदुमराज वाराणसी में राज्य करता है। सारे जम्बूद्वीप को उद्वेलित कर दान देता है। वह तुझे देखकर प्रसन्न होगा। बहुत धन देगा।" उन्होने उसे एक बेंत की टोकरी दी और कहा कि अपने स्वामी को इसमें बिठा कर ले जा। वह अनाचारिणी उस लुञ्जे को बेंत की टोकरी में बिठा, टोकरी को उठा, वाराणसी पहुँच वहाँ दानशालाओ में खाती हुई घूमने लगी। बोधिसत्त्व अलङ्कृत हाथी के कन्धे पर बैठ, दानशाला जा, वहाँ आठ या दस को अपने हाथ से दान देकर घर जाते। वह अनाचारिणी उस लुञ्जे को टोकरी में बिठा, टोकरी उठा, राजा के रास्ते में खडी हुई। राजा ने देखकर पूछा—"यह क्या है?" 'देव! एक पतिव्रता है।" उसे बुलवा कर, पहचान कर, लुञ्जे को टोकरी से निकलवा कर पूछा— "यह तेरा क्या लगता है?" 'देव! यह मेरी बुआ का लडका है। कुलवालो ने मुझे इसे सौंपा है। यह मेरा स्वामी है।" मनुष्य उनके बीच के भेद को न जानते थे। वे उस अनाचारिणी की