भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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मणिचोर ] २८७ न सन्ति देवा पवसन्ति नून नहूनून सन्ति इध लोकपाला सहसा करोन्तान असञ्ञतान नहूनून सन्ति पटिसेधितारो ॥ [ असयमी, दुस्साहसिक दुष्कर्म करने वालो को रोकने वाले न देवता हैं (यदि हैं तो समय पर चले जाते हैं) न ही यहाँ लोकपाल हैं—उन्हें रोकने वाला कोई नहीं । ] न सन्ति देवा इस लोक में सदाचारियों की देख भाल करने वाले तथा पापियो को रोकने वाले देवता नही है। पवसन्ति नून, अथवा इस प्रकार के मौको पर वह निश्चय से प्रवास को चले जाते हैं। इध लोकपाला इस लोक में लोकपाल कहलाने वाले श्रमण-ब्राह्मण भी सदाचारियो पर अनुग्रह करने वाले नहू नून सन्ति। सहसा करोन्तान असञ्ञतान, सहसा बिना विचारे दुस्साहस, कठोर-कर्म करने वाले दुराचारियो को। पटिसेधितारो इस प्रकार का कर्म मत करो। ऐसा करना नही मिलेगा--इस प्रकार रोकने वाले नहीं। इस प्रकार उस सदाचारिणी के रोने पीटने से देवेन्द्र शक्र का आसन गर्म हुआ। शक्र ने सोचा कौन है जो मुझे मेरे आसन से गिराना चाहता है ? पता लगाने से जब उसे यह कारण मालूम हुआ तो उसने सोचा—'वाराणसी नरेश अत्यन्त निर्दयता का काम कर रहा है। सदाचारिणी सुजाता को कष्ट दे रहा है। अब मुझ पहुँचना चाहिए।' उसने देवलोक से उतर अपने प्रताप से हाथी की पीठ पर जाते हुए उस पापी राजा को उतार सीस काटने की जगह पर सीधा लिटा, बोधिसत्त्व को उठा सब अलङ्कारो से अलङ्कृत कर राजवेष पहना हाथी के कन्धे पर बिठाया। फरसा उठा कर खड़े सीस काटने वालो ने राजा का सिर काट दिया। सीस कट जाने पर ही उन्हें पता लगा कि यह राजा का सिर था। देवेन्द्र शक्र ने दिखाई देने वाले शरीर से बोधिसत्त्व के पास जा बोधिसत्त्व को राज्याभिषेक तथा सुजाता को अग्रमहिषीपद दिलवाया। अमात्य तथा