जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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काट। में जाकर ऐसा करूँगा जिसमे वह आने न पाएँ। इस प्रकार हम दोनो के प्रयत्न से हमारे मित्र की जान बचेगी। इस बात को प्रकट करते हुए यह गाथा कही— इदं वढमयं पासं छिन्द दन्तेहि कच्छप अहं तया करिस्सामि यथा नेहिति लुद्दको ॥ [देख कछुए ! तू दांतो से चमडे के जाल को काट। मैं ऐसा करूँगा जिससे शिकारी आने न पावे ।] कछुए ने चमडे की डोरी खानी शुरू की। कठफोडा शिकारी के घर गया। शिकारी प्रात काल ही शक्ति लेकर निकला। पक्षी ने यह जान कि वह घर से निकल रहा हूँ आवाज कर, परो को फडफडा कर आगे के द्वार से निकलते हुए उसके मुंह पर चोट की। शिकारी ने सोचा—मनहूस पक्षी ने मुझ पर प्रहार किया। वह रुका, थोडी देर लेट फिर शक्ति लेकर उठा। 'पहले यह आगे के द्वार से निकला, अब पीछे के द्वार से निकलेगा' सोच पक्षी जाकर घर के पीछे की ओर बैठा। शिकारी ने भी यह सोचा—आगे के द्वार से निकलते समय मैने मनहूस पक्षी देखा अब पिछले द्वार से निकलूंगा। वह पीछे के द्वार से निकला। पक्षी ने फिर जाकर आवाज लगा मुंह पर चोट की। शिकारी ने कहा—फिर मुझ पर मनहूस पक्षी ने चोट की। यह मुझे निकलने नही देता। वह रुका, अरुणोदय तक लेटा रहा; फिर अरुणोदय होने पर शक्ति लेकर निकला। पक्षी ने जल्दी से जाकर बोधिसत्त्व को सूचना दी कि शिकारी आ रहा है। उस समय तक कछुए ने एक को छोड शेष सभी डोरियाँ काट डाली थी। उसके दांत गिरने वाले हो गए थे, मुंह लोहू से लाल हो गया था। बोधिसत्त्व शिकारी को शक्ति लिए बिजली की तेजी से आता देख बन्धन तोड वन में जा घुसा। पक्षी वृक्ष-शाखा पर जा बैठा। कछुआ दुर्बलता के कारण वहीं पड़ा रहा। शिकारी ने कछुए को एक थैली में डाल किसी ठूंट पर रख दिया। बोधिसत्त्व ने मुड कर देखा तो पता लगा कि कछुआ पकड़ा गया। उसने सोचा—मित्र की जान बचाऊँगा। तब उसने अपने आपको शिकारी को ऐसे