भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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कुरुङ्गमिग ] ३२५ दिखाया जैसे बहुत दुर्बल हो गया हो। शिकारी ने सोचा—यह (घोर) दुर्बल होगा; इसे मारूँगा। उसने शक्ति ले बोधिसत्त्व का पीछा किया। बोधिसत्त्व न बहुत दूर, न बहुत नजदीक चलते हुए उसे ले जंगल में गए। जब जाना कि दूर निकल आए तब मुड़ कर दूसरे रास्ते से हवा की तेजी से जा, सींग से थैली उठा, जमीन पर गिरा, फाड़ कर कछुए को बाहर निकाला। कठफोडा भी वृक्ष पर से उतरा। बोधिसत्त्व ने दोनो को उपदेश देते हुए कहा— तुम्हारी सहायता से मेरे प्राण बचे। मैने भी तुम्हारे प्रति मित्र का कर्तव्य पालन किया। अब वही शिकारी आकर तुम्हे पकड़ न ले, इसलिए मित्र कठ- फोडे, तू अपने पुत्रो को ले दूसरी जगह चला जा, और मित्र कछुए तू पानी में जा। उन्होने वैसा किया। शास्ता ने बुद्ध होने पर दूसरी गाथा कही— कच्छपो पाविसि वारिं कुरुङ्गो पाविसि वनं सतपत्तो दुमग्गम्हा दूरे पुत्ते अपानयि ॥ [ कछुआ पानी में जा घुसा। कुरुङ्ग वन में चला गया। कठफोड़ा वृक्ष- शाखा पर से अपने पुत्रो को दूर ले गया।] अपानयि, अपनयि अर्थात् लेकर चला गया। शिकारी वहाँ आ किसीको न देख फटी थैली ले दुःखी चित्त से अपने घर गया। वे भी तीनो मित्र जीवन भर विश्वास बनाए रखकर यथाकर्म गए। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय शिकारी देवदत्त था। कठफोडा सारिपुत्र। कछुआ मोग्गल्लान। कुरुङ्ग मृग तो मैं ही था।