भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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कन्दग २८ ] ३३५ ख. अतीत कथा पूर्व काल में वाराणसी म ब्रह्मदत्त के राज्य करने समय बोधिसत्त्व हिम- वन्त प्रदेश में कठफोरनी पक्षी होकर उत्पन्न हो खदिरवन में ही रहने लगे। उसका नाम खदिरवनी ही हो गया। उसका एक बन्दगळक नाम का मित्र था। यह पाळिभद्रक वन में रहता था। एक दिन यह खदिरवनी के पास गया। खदिरवनी ने 'मेरा मित्र आया है' सोच बन्दगळक को ले खदिरवन में प्रवेश कर खदिर के तने को चोंच से ठोग मार कीडे निकाल कर दिए। वन्दगळकत जो जो पाता मीठे पूए की तरह तोड तोड कर खाता। उसे खाते समय ही अभिमान हो गया। यह भी कठफोरनी योनि में पैदा हुआ है, मैं भी। मुझे इसके दिए शिकार से क्या प्रयोजन ? मैं स्वयं ही शिकार करूंगा। उसने खदिरवनी से कहा—"मित्र ! तू कष्ट मत उठा। मैं ही खदिरवन में शिकार करूँगा।" उसने उसे कहा—मित्र ! तू सेमर पालिभद्रक आदि वन म निसार लकडी में शिकार करने वाले कुल में पैदा हुआ है। खदिर की लकडी सारवान् होती है, कठोर होती है। तू यह इच्छा मत कर। बन्दगळत बोला—क्या मैं कठफोरनी की योनि में पैदा नही हुआ ? उसने उसका कहना न मान जल्दी से जा खदिर वृक्ष पर चांच से ठोग मारी। उसी समय उसकी चोच टूट गई। आँखें बाहर निकली सी हो गईं। सीस फट गया। वह तने पर खडा न रह सकने के कारण जमीन पर गिरा और पहली गाथा कही— धम्भो को नामय रुक्खो सीनपत्तो सकण्टको, यत्थ एकप्पहारेन उत्तमाङ्गं विपाटित ॥ [भो ! इस पतले पत्तो वाले काँटेदार वृक्ष का क्या नाम है, जिस पर एक ही चोट करने से मेरा सिर फट गया ।] ———— धम्भो को नामय रुक्खो, भो खदिरवनी ! इस वृक्ष का क्या नाम है ? को नाम सो यह भी पाठ है। सीनपत्तो सूक्ष्म पत्तो वाला। यत्थ एकप्पहारेन, जिस वृक्ष पर एक ही चोट लगाने से उत्तमाङ्ग' विपाटित, सिर फूट गया, न