जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंधम्मट्ठ ] ३६५ बोधिसत्त्व ने मन में करुणा का भाव ला कर कहा—अरे, आ तेरे मुकद्दमे का फैसला करूँगा। यह उसे लेकर मुकद्दमे की जगह गए। जन-समूह इकट्ठा हो गया। बोधिसत्त्व ने उस मुकद्दमे के फैसले को उलटते हुए फिर स्वामी को ही स्वामी बना दिया। जन-समूह ने 'वाह वाह' की। बडा शोर हुआ। राजा ने सुनकर पूछा—यह क्या आवाज है ? 'देव ! धर्मध्वज पण्डित ने एक ऐसे मुकद्दमे का जिसका ठीक फैसला नहीं हुआ था, ठीक फैसला किया है। उसीमें यह 'वाह वाह' हो रही है।" राजा ने सन्तुष्ट हो बोधिसत्त्व को बुलाकर पूछा—'आचार्य ! तुमने मुकद्दमे का फैसला किया ? 'हाँ महाराज ! काळक ने जिस मुकद्दमे का ठीक फैसला नहीं किया, उसका फैसला किया।" "अब से तुम ही मुकद्दमे का फैसला किया करो। मेरे कानो को सुख मिलेगा। जनता की उन्नति होगी।" उसके इच्छा न करने पर भी राजा ने 'प्राणियो पर दया करने के लिए न्याय की गद्दी पर बैठें' प्रार्थना कर राजी किया। तब से बोधिसत्त्व न्याय की गद्दी पर बैठने लगे। स्वामी को ही स्वामी बनाते। उसके बाद से जब काळक को रिशवत न मिलने के कारण लाभ की हानि हुई तो उसने "महाराज ! धर्मध्वज पण्डित आपका राज्य चाहता है" कह राजा और बोधिसत्त्व में भेद पैदा करने की कोशिश की। राजा ने अविश्वास करते हुए मना किया—ऐसा मत कहो। वह बोला— यदि मेरा विश्वास नहीं करते तो उसके आने के समय झरोखे से देखें। तब देखेंगे कि इसने सारे नगर को अपने हाथ में कर लिया है। राजा ने उसके पास मुकद्दमे के लिए आए लोगो को उसीके आदमी समझ विश्वास कर पूछा— सेनापति ! क्या करें। "देव ! इसे मार डालना चाहिए।" "कोई बडा दोष दिखाई न देने पर कैसे मारें ?" "एक उपाय है।" "कौन सा उपाय ?"