भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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३६६ [ २.७.२२० "इसे कोई असम्भव कार्य्य करने के लिए कह कर उसके न कर सकने पर, उस दोष पर दोषी बता मारेंगे।" "कौन सा असम्भव कार्य्य ।" "महाराज, खरगेज भूमि में लगाने पर, देख भाल करने पर उद्यान तो चार साल में फल देता है। आप उसे बुलाकर कहें कि कल हम उद्यान में खेलेंगे। हमारे लिए उद्यान बनाओ। यह न बना सकेगा। तब उसे इस अपराध के कारण मार देंगे।" राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर कहा—'पण्डित ! पुराने उद्यान में हम बहुत खेले। अब नए उद्यान में क्रीडा करने की इच्छा है। कल क्रीडा करेंगे। हमारे लिए उद्यान बनाएं। यदि न बना सकोगे, तो तुम्हारी जान नही बचेगी।" बोधिसत्त्व समझ गए कि कालक को रिश्वत न मिलने से उसने राजा को फोड़ लिया होगा। वह "महाराज ! कर सका तो दूंगा" कह कर जा प्रणीताहार ग्रहण कर चारपाई पर लेट सोचने लगे। शक्रभवन गर्म हो गया। शक्र ने ध्यान लगाकर देखा। बोधिसत्त्व की पीडा को जान उसने जल्दी से आ, सोने के कमरे में प्रवेश कर आकाश में खड़े हो पूछा—पण्डित क्या चिन्ता कर रहे हो ? "तू कौन है ?" "मैं शक्र हूँ।" "राजा ने मुझे उद्यान बनाने को कहा है। उसकी चिन्ता कर रहा हूँ।" 'पण्डित, चिन्ता न कर। मैं तेरे लिए नन्दनवन चित्रलतावन सदृश उद्यान बना दूंगा। किस जगह पर बनाऊँ ?" "अमुक स्थान पर बना।" शक्र बनाकर देवपुर चला गया। अगले दिन बोधिसत्त्व ने उद्यान को प्रत्यक्ष देख जाकर राजा को कहा— महाराज, मैने उद्यान समाप्त कर दिया है। खेले। राजा ने जाकर देखा अठारह हाथ की, मनोशिलावर्ण की दीवार से घिरा, द्वार-अट्टालिका सहित, फूल फल के भार से लदा हुआ, नाना प्रकार के वृक्षो से सजा हुआ उद्यान है। उसने कालक से पूछा—पण्डित ने हमारा कहना किया। अब क्या करें ?